Wednesday, 20 March 2013

अशोक आंद्रे

विनाश (लघु कथा )
पूरा आफिस सन्नाटे में सिमटा हुआ था। यहाँ तक की दरवाजों और खिडकियों पर लटके पर्दों के हिलने की

आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
राशनिंग का आफिस और सन्नाटा।
दोनों का मिलन कम से कम वहां सबकी समझ को भ्रमित कर रहा था।
आफिस में सब एक दूसरे की आँखों में झांकते हुए खामोश खड़े उस सवाल का अर्थ ढूंढ रहे थे।
तभी कमरे की दाई ओर बैठे सर्कल इन्स्पेक्टर के पास दहाड़ती हुई एक आवाज सुनाई पड़ी। उसके सामने खड़ा

एक फौजी आफिसर कमरे के सन्नाटे की चिंदी-चिंदी कर रहा था। विशाल बाबू के कदम न चाह कर भी कारण

जानने कीउत्सुकता में उस ओर बढ़ गए थे।
फौजी आफिसर अभी भी उसी टोन में दहाड़ रहा था,"मैं ......मैं, पिछले दस दिन से आपके आफिस के चक्कर

लगा रहा हूँ। लेकिन जनाब हैं कि इनसे काम होना तो दूर, इनके दर्शन भी दुर्लभ हैं।"
सर्कल इन्स्पेक्टर चुपचाप फौजी आफिसर को घूरे जा रहा था।
"जब भी जनाब के लिए पूछताछ की,साहब किसी इन्क्वारी के लिए गए हैं। और ......और आज इनका मूड नहीं

है।कभी आप लोगों ने सोचा है कि, अगर हमारे देश पर किसी विदेशी ने आक्रमण कर दिया ........ उस वक्त हम

भी ......."
आसपास के लोगों पर नजर डालते हुए फौजी आफिसर कह रहा था, " हाँ सोचो ! हम भी जेबों में हाथ डाले ......

कहने लगें कि .......कि हमारा भी आज मूड नहीं है। जानते हैं आप ....इसका क्या अर्थ होगा .....विनाश।"
हम सभी की आँखों में फौजी अफसर का सवाल तैर उठा था ....विनाश ....महाविनाश।
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Tuesday, 19 February 2013

अशोक आंद्रे

द्रोपदी की बटलोई ( लघु-कथा )

 
एक बुद्धिजीवी न जाने किस धुन में बहुत तेज गती से चला जा रहा था। अचानक उसकी दृष्टि सड़क पर पड़े एक जीर्ण-शीर्ण बर्तन पर जाकर रुकी।
उसने उसे उठा कर अपनी बुद्धि पर जोर दिया-"ओह,यह तो शायद द्रोपदी की बटलोई है।"
वह खुशी से पागल हो गया और अपनी खोज पर गर्व करते हुए,नए चमत्कार का सूरज चमकाने के लिए शहर की ओर भागा। किन्तु समय की ऊबड़-खाबड़ सड़क
पर उसके अनियंत्रित क़दमों ने ऐसी ठोकर खाई कि धराशायी हुए उठ सकने की क्षमता खो बैठने वाले शरीर से बटलोई काफी दूर जाकर गिरी।
उधर विपरीत दिशा से अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए बढ़ रहे अन्धकार ने धीरे-धीरे सारे दृश्य को अपनी अनंत काली चादर से ढक दिया।
तब से आज तक न तो उस बटलोई का पता चला और न बुद्धिजीवी का ही।
हाँ, और बहुत से बुद्धिजीवी उसी दिशा की ओर जाने के लिए अग्रसर जरूर हैं।
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Monday, 7 January 2013

अशोक आंद्रे

टी वी से पोषित होते हमारे धार्मिक तथ्य (लघु-कथा)
भीड़ - भाड़ से दूर विदुर - कुटी अपने आप में रम्य स्थान होने के बावजूद अपने दुर्दिन को जीती हुई दिखाई को जीती हुई दिखाई दे रही थी।
बहुत चर्चा सुनी तथा पड़ी थी मैंने। महाभारत का एक बहुचर्चित पात्र उपेक्षा के बोध से ग्रसित, अपने अंतिम समय तक वहीं कुटिया बना
आत्मचिंतन में लीन हो गया था। मानो सारा संसार मिथ्या के भ्रम-जाल में फंसा दीख रहा था उसे। सच्चाई जिसकी जिव्हा पर हर समय
विराजती थी कभी, आज जड़ हो उसी धरती पर मौन हो गयी थी।
ऐसे महान व्यक्ति की भक्ती - स्थली को देखने के लिए , एक लम्बे सफर के उपरान्त पहुंचा था पत्नी के साथ। कई सवाल उछाले थे उस
तक। पता नहीं क्यों सारे सवाल निरुतर हो लौट आए थे हम तक।
मन खीझ उठा था। अशांत विक्षोभ सा। पूछने पर पता चला कि वह गत दो वर्षों से वहां कार्यरत है।
उधर पुजारी शांत भाव से मंदिर की जानकारी के साथ-साथ विदुर के बारे में बता रहा था। ठीक पीछे साठ की गिनती गिनता हुआ एक
बूढ़ा व्यक्ति अपनी अनभिज्ञता को शीर्ष पर पहुंचा अस्पष्ट शब्दों में फुसफुसा रहा था .......
"बाबू जी, आप काहे को परेशान हो रहे हो, कल टी . वी . पर महाभारत आएगा ही। आपको विदुर जी के बारे में बाकि की सारी जानकारियाँ
मिल ही जाएँगी।"
मैं, पत्नी के साथ इस जानकारी पर अवाक हुए बिना नहीं रह सका। और उसके द्वारा दी गयी जानकारी पर मन ही मन खिन्न होता हुआ
मंदिर की सीढ़ियाँ उतरने लगा था।
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Monday, 30 May 2011

अशोक आंद्रे

दूसरी मात

दिन की आँख खुलने से पहले ही चिड़ियों की चहचहाहट ने रतन की नींद को पूरी तरह से उचाट दिया था. कुनमुनाते हुए रजाई को एक तरफ धकेल, अंगड़ाई से शरीर
में फुर्ती का एहसास महसूसा था रतन ने. रात्री का टुकड़ा भर अँधेरा अभी भी कमरे की कैद से छूट
नहीं पाया था. चारों तरफ निगाह दौडाते हुए रतन ने अपने को एक बार फिर नितांत अकेला पाया
मन को कहीं अतीत के सहारे और वर्तमान को आँखों में सहेजे उसने जैसे ही दरवाजे के कपार खोल
बाहर के वातावरण को सूंघना चाहा, हवा का सर्द झोंका पूरे कमरे में आतंक फैला गया.
हुं ! यह भीकोई जिन्दगी है, पूरे मौसम को कोसते रहो एक कप चाय की इन्तजार में.अपने पड़ोसी
रामलाल को देखो जिसकी पत्नी आँख खुलने से पहले चाय के साथ मान- मनुहार करती हुई उसे दिनके उजाले काएहसास कराती है." समय बिताने का कितना अच्छा तरीका है स्वयंसे बातें
करनाऔर उन बातों का जिनका न आदि हो और न अंत. दुमुंही की तरह. चाहे जिधर से पकड़ लो चाहे जिधर पहुँच लो.
काफी समय बीत चूका था. रतन सन्यासी की सी लीं मुद्रा में बैठा रहा.
रजाई से हाथ निकाल धीरे से तकिये के नीचे, रतन का हाथ कुछ टटोलने लगा. घड़ी के रेडियम
के सहारे दो सलाइयों के बीच समय को मापने की कोशिश की. वक्त साढ़े पांच का ही था.
चाय की तलब एक बार फिर नन्हे खरगोश की तरह रतन के भीतर
कुलांचे भरने लगी . न चाह कर भी उठना पड़ा उसे. सर्दी में उठकर चाय बनाने का खौफ उसके मुंह
का स्वाद कसैला कर गया. अन्दर का आक्रोश गर्म लावे की तरह फूटने लगा.
तभी एक बारीक चीख ठंडे मौसम को आहत करती हुई उसकी रजाई पर
छा जाती है. पड़ोसी रामलाल कंठ - फोडू स्वर में चीख रहा था-" तू औरत नहीं....सूखी बावडी
है, तभी तो...."
कुछ प्रतिवाद किया था नारी कंठ ने. रामलाल की गर्जना पुन: उभरी थी -
"नंदी क्या असत्य बोलेगा ?"
रजाई को अपने चारों ओर कसते हुए रतन ने सोचा क्या बाँझपन केवल नारी का ही दोष हो सकता है. दोष रामलाल में भी तो हो सकता है. आज आदमी
ब्रहम्मांड को छूने लगा है. जबकि आम हिन्दुस्तानी अभी भी सारा दोष औरत पर मढ़ कर ही
चैन की नींद सोने की कल्पना संजोये अपनी मर्दानगी बखानता रहता है.
रतन को याद आया कि हाल ही में रामलाल के घर के सामने एक
आदमी बैल के साथ खडा लोगों के भविष्य को बता रहा था.और उसका दावा था कि कोई भी
आदमी, बैल द्वारा बताए गए भविष्य को चुनौती नहीं दे सकता. वह भविष्यवाणी को गलत साबित करने वाले को एक हजार का इनाम देगा.
उसकी इस बात ने लोगों के दिल पर काफी गहरा असर किया था.
उसी भीड़ के बीच खड़े रामलाल ने भी अपना सवाल उस बैल के
सामने रखा था. बैल ने सवाल सुन कर अपना सिर नकारात्मक मुद्रा में हिला दिया था. रामलाल
सन्नाटे में आ गया था. तभी तो रामलाल इस वक्त अपनी पत्नी को इस कदर दुत्कार कर
उसे 'सूखी बावड़ी' कह रहा था.

बैल वाला शहर के बाएं कोने में अपनी एक जवान लडकी के साथ रहता था. परिवार के नाम पर सिर्फ यही लडकी थी. जिसे पत्नी ने मरते वक्त इकलौती धरोहर
के रूप में उसके पास छोड़ा था. पत्नी की मौत ने उसे बुरी तरह से तोड़ कर उसके पूरे अस्तित्व
को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित कर दिया था.
मौत से कुछ दिन पहले उसकी पत्नी ने एक दिन नंदी से
पूछा था चुपके से,अपनी जिन्दगी की चुकती सांसो के बारे में. लम्बी बीमारीनेउसके शरीर
को पुराने खंडहरों में तब्दील कर दियाथा. शरीर का आधा हिस्सा लकवे का शिकार हो
गया था.
बैल वाले को पूरी उम्मीद थी कि उसकी पत्नी जरूरत
वैद्यजी के द्वारा दी गयी जड़ी- बूटी से पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी . और फिर .... उसका घर.....
एक दिन ...हरी बगिया की तरह महकने लगेगा. लेकिन ....नंदी की बात को झुठला नहीं
पाया था तब. और समय अपनी रफ्तार बढाता हुआ कब खिसक गया. पता ही न चला .

कभी नंदी की पूंछ से खेलती नंगे पांव चलती उसकी बेटी
भी साथ होती थी. बेटी के बड़े हो जाने पर वह अब नंदी के साथ अकेला जाता है.
लडकी को अगर साथ ले चले तो लोग अपने भविष्य और
भाग्य से ज्यादा लडकी में रुची लेने लगेंगे, यह वह जानता है.
शाम अक्सर बौराए मन की तरह उसके खाली समय में
तरंगित हो उठती, जब वह भांग का अंटा चढ़ा लेता था. तब उसकी मस्ती उसके स्व को छूती
हुई आसपास के पूरे माहौल को जिन्दादिली का एहसास कराती. कई बार वहां से गुजरते हुए
रतन ने स्वयं अपनी आँखों से यह देखा तथा महसूसा था.
इस बैल को वह अपने सगे लड़के की तरह प्यार उसका
पूरा विश्वास था कि उसका बैल उसी नंदी का अवतार है जिसकी जिह्वा पर ब्रह्मा का वास था.
इसीलिए उसने इसका नाम नंदी रख छोड़ा था.
खाली समय में कई बार अपनी जवान हो आई बेटी का
भविष्य इसी बैल से बचवाता था. पूरा विश्वास था उसे कि उसकी बेटी का विवाह किसी राजकुमार से होगा. जब-जब इस सवाल को उसने कागज के चंद टुकड़ों के सहारे बैल के
पैरों की तरफ उछाला , उसने हर बार राजकुमार वाले कागज़ को ही अपने खुर से दबाकर उसके
विश्वास को पुख्ता किया था.

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काफी समय बीत गया था बस स्टाप पर खड़े हुए. घड़ी
देखी. करीब एक घंटा गुजर चुका था. दूर-दूर तक बस के आने के निशाँ तक सड़क पर से गायब
थे. 'कहीं बस की स्ट्राइक तो नहीं हो गयी है.' उसने अपने आप से पूछा .
दिल्ली जैसे महानगर में इस तरह की घटनाएँ बिना पूर्व
सूचना के अक्सर घट जाया करती हैं.
आसमान पर छितराए बादल इकठ्ठा होने लगे थे. आज दिनभर गर्मी भी काफी रही. कल ही तो टी.वी. पर हिंदी समाचार के अंत में कहा गया था कि
कल आंधी के साथ गरजकर छींटे पड़ने की संभावना है.
खैर ! आंधी के आसार तो नजर नहीं आ रहे थे. लेकिन
बारिश के आसार जरूर नजर आ रहे थे.
बस स्टाप पर कुल तीन सवारियां ही बस का इन्तजार
कर रही थीं अब. महिला सवारी बार-बार घड़ी देखती तथा माथे पर तिर आए पसीने को दूसरे हाथ
में पकड़े रूमाल से पोंछने का प्रयास करती. वह शायद आज पहली बस पकड़ने से वंचित रह गयी
लगती थीं. उस महिला के स्थान पर रामलाल की पत्नी का स्वरूप प्रतिबिंबित होकर उभरने लगा
था. न चाह कर भी उस दिन की सुभह की घटना को भुला नहीं पा रहा था. पता नहीं क्यों नारी
ही हर बुरी स्थिति को भोगने के लिए अभिशप्त है.
कई बार नारी ही नारी की दुश्मन होती है. कई बार रामलाल
के पड़ोस में रहने वाली औरतों ने कटाक्ष किये थे. रामलाल उन व्यंग वाणों को सुनकर तिलमिला जाया करता था. उसी आक्रोश की प्रतिक्रिया ही तो थी उस दिन. दस महीने पहले सुने शब्द इस
वक्त उसके कानों में 'सूखी बावड़ी' बन कर गूँज रहे थे.
अब अन्धेरा काफी तिरने लग गया था. बस का अभी भी कुछ
अता-पता नहीं था.
चार किलोमीटर की दूरी पर ही तो घर है, रतन ने जैसे खुद को ललकारा और खरामा-खरामा चल पडा. थोड़ी दूर पैदल चलने पर उसे चने बेचने वाला दिखाई
दिया. एक रूपये के चने लेकर वह बढ चला.
अब हवा में काफी नमी थी. बादल काफी घिर आए थे.
लगा, बरसात जरूर होकर रहेगी.
दो- ढाई किलोमीटर चला होगा कि वर्षा टूट पडी.काफी
देर तक एक पेड़ के नीचे रुक कर वह बरसात थमने का इन्तजार करता रहा. लेकिन बरसात
थमने के आसार नजर नहीं आ रहे थे.
अब तक वह काफी भीग चुका था. पेड़ के नीचे और
रुके रहने का कोई औचित्य उसे नजर नहीं आया. वह एक बार फिर पैदल चलने का संकल्प
लेकर चल पड़ा .
बस्ती के करीब पहुंचने तक अन्धेरा काफी हो चला था.अब बरसात भी रुक-रुक कर हो रही थी. बस्ती की झुग्गियों में से धुआं रिसता भी दीख
रहा था. काफी भीड़ जमा थी. बाईं तरफ से दूसरे छोर की झुग्गी केबाहर जहां पुलिसवालों ने
झुग्गी को चारों ओर से घेर रखा था. हर आने वालों को पुलिस वाले सशंकित नजरों से देख
रहे थे. झुग्गी के अन्दर अँधेरा होने के कारण कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.
- "यह तो उसी बैल वाले की झुग्गी है." उसने
अपने आप से सवाल किया.
वहीं एक कोने पर, वही बैल वाला आदमी दहाड़
मार-मार कर चीख रहा था. ठीक दूसरे कोने पर खूंटे से बंधा बैल खामोश निगाहों से अपने
बिलखते मालिक की तरफ देख रहा था.
"क्या हुआ भाई !" मैंने पास खड़े एक आदमी से
पूछा. होना क्या है बाबूजी ? गरीब आदमी की तो कोई इज्जत ही नहीं रही इस संसार में.
किसी का भला क्या बिगाड़ा था इस आदमी ने ? उसने बैल वाले की की इशारा करते हुए
कहा.
"मैं आपकी बात समझा नहीं," उसने बैल वाले की
तरफ देखते हुए कहा जो अब बदहवास सा आँखे फाड़े सबको देख रहा था.
......
उसने एक बार फिर उस आदमी की तरफ देखा
जिसने अस्पष्टता की तलहटी में फ़ेंक बुरी तरह उलझा दिया था उसे. आसमान में बादल जरुर
छितरा कर इधर-उधर फैल गए थे किन्तु रतन का सवाल अभी भी सुलझ नहीं पाया था.
उस भीड़ को ठेल, थोड़ी सी जगह बना कर झाँकने
की कोशिश की लेकिन भीड़ ने उसे फिर वापस उसी बिंदु पर पहुंचा दिया.
प्रस्थान बिंदु पर पहुंच कर, उसी आदमी को दोबारा
टटोलने की कोशिश की. बार-बार सवाल करने पर वह आदमी काफी झुंझला गया .
" जरा आगे बढ कर स्वयं ही देख लो. क्या हुआ है?"
"मेरा मतलब यह है कि.....आखिर हुआ क्या है?" किसी की इज्जत दिन दिहाड़े लुट जाए और
आप कहते हैं कि माजरा क्या है? इसकी जवान लडकी की दिन-दिहाड़े इज्जत ..... घृणा का
गाढ़ा सैलाब अब उसके चेहरे पर फैल गया था.
लगा, ठीक ही तो कह रहा है यह. मस्ती से भरे
शांत जीवन में कोई ज़हर घोल दे और सब चुपचाप देखते रहें. मन काफी उदास हो गया. बरसात
की फुहारों से भीगी ठंडी हवा आग के शोलों सी लग रही थी उसे अब.
उस आदमी का विश्वास तड़क कर पैरों में घाव करने
लग गया था. जिन्दगी भर जो दूसरों के भाग्य बताता रहा, आज स्वयं भाग्य रूपी भंवर में फँस
कर चारों खाने चित पड़ा कराह रहा था . सान्तवना का एक भी शब्द उसके लिए बेमतलब सा लग
रहा था उसे.
रतन ने देखा सामने से रामलाल तेजी से भागता चला आ रहा था. उसके चेहरे पर अद्भुत चमक तैर रही थी. मन आशंका से भर उठा उसे देख कर. उसने कहीं.....
पत्नी को...... जिज्ञासा को दबाते-दबाते भी पास आने पर, बांह पकड़ पूछ ही डाला था रतन ने-अरे ,
भाई रामलाल, क्या बात है?"
"भाई साहब , मैं जरा जल्दी में हूँ . अभी आकर
बताता हूँ. जरा दाई को लेने जा रहा हूँ." इतना कह कर वह तेजी से चला गया.
रतन अब नंदी को देखने लगा था. बैल खामोश
निगाहों से शुन्य में घूर रहा था. पता नहीं उन निगाहों में रामलाल की पत्नी के लिए 'हाँ' थी
या फिर न!
धीरे-धीरे सधे क़दमों से उसकी तरफ चला आया
था रतन. नंदी रुपी बैल ने एक बार उसको देखने के उपरान्त खिन्नता का बोध लिए नकारात्मक
मुद्रा में अपना सिर हिला दिया. शायद उसने रामलाल की बात सुन ली थी जिसे कभी उसने संतान
के सुख से वंचित रहने का संकेत दिया था और ....आज वह .....अपने मालिक की पुत्री की मौत
को भी पचा नहीं पा रहा था.
पता नहीं चूक कहां हुई थी. लेकिन रतन इन
सारी परिस्थियों को देख कर काफी असहज हो उठा था. जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल उसने
एक सिगरेट सुलगाई थी. उसका धुंआ चारों तरफ फैले अँधेरे को और सघन कर रहा था. वहां
खड़ा रहना भी रतन के लिए असंभव प्रतीत हो रहा था. धरती और आसमान उसे घूमते नजर
आ रहे थे.
एक निग़ाह चारों तरफ डाल रतन अपने
घर की ओर चल दिया था जहां रामलाल के कमरे में नन्हा- सा जीवन चीख-चीख कर अपने
अस्तित्व का बोध करा कर नंदी को दूसरी मात दे रहा था.

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Wednesday, 19 January 2011

अशोक आंद्रे

और वह

ठीक दस साल के अंतराल के बाद अपने शहर लौट रहा था वह. यह शहर उसका अपना था . जहां उसके जीवन के बीस बसंत हँसते- खेलते एक दिन अचानक ही विदा हो गए थे . बाबू को उसके खेलों से काफी चिढ होती थी . अक्सर खेल के मैदान से लौटने के उपरांत उसकी पिटाई भी हो जाती थी. बाबू चाहते थे कि सारा-सारा दिन खेलने की बजाए वह कुछ पढाई में ध्यान लगाए . लेकिन उसके मन को खेलने के सिवा और कुछ सुहाता ही न था . और खेल-खेल में ही तो वह कब जवानी की देहलीज पार करता हुआ निशा से जा टकराया था . पता ही न चला . निशा उसके पडोस में रहती थी . याद आते ही मन काफी उदास हो उठा था . हवा तेज थी . सड़क के किनारे लगे हुए पेड़ों के पत्ते भी हवा के झोंको के साथ सरसराहट की आवाज करते हुए, उसके कदमों को तेज चलने के लिए उकसाने लगे .
इन्हीं पेड़ों पर वह कितनी बार चढ़ा - उतरा है निशा के कहने पर । कितना अच्छा
लगता था पेड़ों पर फैले घने पत्तों की सरसराहट के बीच से अनायास ही निशा को निहारते रहना . वह भी उसे घूरते देख जोरों से खिलखिला उठती थी. तब वह सिर्फ झेंपकर दूसरी ओर ताकने लग जाता था.
कितना अजीब लगता है आज सोचने पर, गाँव का निपट बेवकूफ - सा दिखने
वाला लड़का , पुलिस इंस्पेक्टर के पद को सुशोभित कर रहा है। बापू तो खुशी से फूले नहीं समाए थे। गाँव भर मे बूंदी के लड्डू बांटे थे। गर्व से अपने सीने को दुगना फैला कर मूंछो का ताव देते हुए, हर मिलने वाले के सामने प्रशंसा में शब्दों का भण्डार खोल देते. लेकिन माँ........
वह अक्सर डरी - डरी सी रहने लगी थी. पुलिस की भी कोई नौकरी होती है ?
हर वक्त एक बदनाम चेहरा नकाब की तरह ओढ़े फिरो . कोई खुल के बात भी नहीं करता है. जिसे देखो , डरा हुआ - सा कन्नी काटने को आतुर दिखता है. लेकिन माँ को कैसे समझाता कि आखिर पेट भी तो कोई चीज होती है. जिसके लिए कोई न कोई नौकरी तो करनी ही पड़ती है.
लगा, हवा फिर तेज हो गयी है. अन्धेरा भी कुछ ज्यादा ही घिर आया है. सर्दी की
रातें लम्बी और गहरी होती हैं ना, इसीलिये पेड़ों के पीछे से कई भूतिया चेहरे उभरने लगते हैं. उन चेहरों के पीछे एक चेहरा जाना पहचाना - सा लगता है.
पिछले साल कि तो बात है. जब उसे हेडक्वार्टर पर उसे बुलाया गया था . मौसम
भी इसी तरह करवटें बदल रहा था उन दिनों . मन किसी काम में न लग कर कमरे में बंद हो जाने को हो रहा था.
ठीक उन्हीं क्षणों में उसके अन्दर के पिघलते एहसासों को किसी ने दरवाजों की
सांकल बजाकर , ध्यान भंग किया था . अन्दर ही अन्दर कुढ़ते हुए दरवाजा खोला था उसने. बाहर कोतवाली से आया हवलदार शमशेर सिंह खडा था . उसे देखते ही झट , सैल्यूट ठोककर कोतवाली में हाजिर होने का परवाना थमा दिया था, उसके हाथ में.
तब वह वर्दी पहनकर , उसी के साथ कोतवाली के लिए रवाना हो गया था . रात के ग्यारह बज रहे थे. कोतवाली सन्नाटे की रजाई ओढ़े शांत दीख रही थी. मन में आशंका कुलबुलाने लगी थी. कहीं .....
कोतवाली की दाईं ओर मोटर गाडी खडी करके, अपने कमरे की तरफ मुड़ गया था . सामने उसका अर्दली कमरे के बाहर बैठा ऊँध रहा था. उसकी पदचाप को सुन वह हडबडाकर उठ खडा हुआ.
एक गिलास पानी पीकर , बड़े साहब के कमरे की तरफ चल दिया था वह. जहां बड़े साहब अपनी मेज पर झुके फाईलों के अन्दर बड़ी तल्लीनता से कुछ खोजते हुए दिखे.

धीरे से पर्दा हटा , उसने पहुंचने का संकेत दिया था. बड़े साहब ने उसे देखते ही
बैठने के लिए कहा तथा कुछ पेपर्स सामने रखते हुए कहने लगे- देखो ! तुम हमारे पुलिस विभाग में सबसे ज्यादा समझदार तथा योग्य व्यक्ति हो इसीलिये मैं तुम्हें यह काम सौंप रहा हूँ । आजकल हमारे शहर में तस्करों का बहुत बड़ा गिरोह सक्रिय है. उस गिरोह में एक विशेषता है कि वे अपने सारे कार्य किसी न किसी युवती के माध्यम से कराते हैं . ऐसी ही एक युवती मालविका है जो शहर में इस गिरोह के लिए कार्य कर रही है. लेकिन इस युवती पर हाथ डालना इतना आसान नहीं है. जरा होशियारी से काम करना होगा. अगर तुम इस युवती को किसी तरह से काबू कर सको तो समझ लो बहुत बड़ा किला फतह कर लोगे . फिर उसका हुलिया बताते हुए मुस्कराकर मेरी ओर देखते हुए कहने लगे- इसमें पदोन्नति के भी चांसिस हैं.
पिछले हफ्ते ही की तो बात है जब हैडक्वाटर की सूचना पर तस्करों के एक
गिरोह का पीछा कर रहा था । हवलदार शमशेर सिंह भी उसके साथ था। जो उस युवती के बारे में सही-सही जानकारी रखता था। लेकिन लम्बी दौड़ धूपके बावजूद वह युवती उसकी आँखों में धूल झोंककर गायब हो गयी थी।वह सिर्फ हाथ मलता रह गया था उस दिन।
साहब अभी भी उससे कुछ कह रहे थे. और वह उनकी हिदायतों पर गौर करता
हुआ अन्दर ही अन्दर प्लान बना रहा था. और विशवास की एक परत उसकी आँखों के सामने फैल गयी थी.
उसने चुपचाप उन पेपर्स को फाइल के साथ उठाया और अपने कमरे की तरफ
चला आया और फिर वह सीधे अपने कमरे की तरफ चला आया जहां बैठकर फिर नये सिरे
से उन फाईलों को उलटने-पलटने लग गया था. अचानक एक फाइल के पेज नं उन्नीस पर उसकी निगाह पड़ गयी. जहां कुछ चौंकाने वाली बात अविश्वास के गलीचे पर उठ खडी हुई थी.

उसे याद आया एक दिन वह बाजार में कुछ खरीदारी कर रहा था ठीक उसी वक्त
निशा से मुलाक़ात हो गयी थी. निशा शायद जल्दी में थी. औपचारिक बातचीत के दौरान ही निशा ने उसे घर आने का निमंत्रण दे डाला था. जिसे सहर्ष ही स्वीकार कर विदा ले ली थी निशा से उसने.
यह वही पेज था जिस पर, मालविका नाम की युवती के बारे में बड़े विस्तार से
वर्णन किया गया था. कद ५"-२"उम्र तीस साल. और ...... शहर का नाम पढ़ते ही चौंक गया था.

ध्यान आया निशा भी तो उसी शहर की है. उसे बहुत बाद में पता चला था कि उसकी शादी किसी आर्मी आफिसर से हुए थी. लेकिन नामों में कोई तारतम्य न होने के कारण वह फिर उन्हीं फाइलों में खो गया था.
आज उसकी जिन्दगी में सबसे बड़ा इम्तहान हेने जा रहा था. लगातार कितनी मेहनत
करने के उपरान्त उस केस से सम्बंधित , मुख्या सूत्र उसके हाथ लग गया था. अब सिर्फ उस युवती को किसी तरह से पकड़ कर अपनी खोज को जारी रखते हुए, पूरे गिरोह को जेल के सींखचों के पीछे करना था. उन दिनों युद्ध स्तर पर कार्य किया था उसने. सारी कार्यवाही को गुप्त रखा गया था ताकि अपराधी को हवा भी न लग सके.
सवेरे उठते ही उसने हेडक्वार्टर को फोन करके दो नारी पुलिस कांस्टेबल के साथ पांच
अन्य सहयोगी मंगवाए थे . वे सभी सादे कपड़ों में आएं इस बात की ताकीद कर दी गयी थी .
शाम के छ: बज रहे थे. सभी सहयोगी निश्चित समय तक पहुंच चुके थे. सभी को ख़ास-ख़ास
निर्देश देने के बाद उसने भी सादे कपडे पहन लिए थे.
सर्दियों में शाम साढ़े छ: बजे के आसपास ही अँधेरे वातावरण में गहराने लगे थी. सड़कों
पर आम आदमी की चहल-पहल भी सिमट कर अपने घरों की चार दीवारी में कैद हो जाती है. वैसे भी पाश कालोनी में अक्सर सन्नाटे का सैलाब चहल कदमी करता दिखलाई देता है. इसीलिये उसने इस वक्त को चुना था ताकि सारी कार्यवाही बिना किसी झंझट के निबट जाए .
तभी सामने से एक आध कार हार्न बजाती हुई उसके निकट से निकल गई. पत्तों की सरसराहट भी उस वक्त चौकन्ना बने रहने के लिए पर्याप्त थी उसके लिए. हाँ ! दो चार कुत्ते जरुर भौंक कर उस
कालोनी के चारों ओर फैले वातावरण में जिन्दगी का एहसास करा जाते. तभी एक व्यक्ती साईकिल पर तेज-तेज पैडल मारता उसके सामने से निकल कर पाशर्व में बनी एक कोठी में जाकर लुप्त हो गया.
लेकिन वह हर तरह से आश्वस्त हो जाना चाहता था. इसीलिए एक निगाह अपने साथियों
पर डाल, सीधे कोठी के चारों तरफ फैले वातावरण को सूंघने की कोशिश की. कहीं कोई ख़तरा न पाकर, धीरे-धीरे कोठी के सामने वाले दरवाजे के करीब पहुंच गया. कंटीली फेंसिंग से घिरी, फूलों से लदी यह कोठी कितनी सुन्दर लग रही थी.
अब फिर एक अजीब सी आशंका उसके दिल और दिमाग में कुनमुनाने लग गयी थी.
क्या संपन्न घरों की युवतियां इस तरह के कार्य कर सकती हैं. नहीं....नहीं, कहीं उसके दिमाग को गलतफहमी तो नहीं हो गयी है. आखिर कौन सी परिस्थितियाँ उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं.
ध्यान आया. उसने कहीं पढ़ा था कि संपन्न घरों की लड़कियां प्रेम में किन्हीं गलत व्यक्तियों
के चक्कर में फँस कर तमाम उम्र उनके इशारों पर कठपुतलियां बनी नाचती रहती हैं. कहीं इसके साथ भी वैसा ही चक्कर तो नहीं..... "ओह माई गाड...... " सोचते -सोचते उसका सिर बुरी तरह भन्नाने लगा था. तभी उसकी नौकरी ने उसकी भावनाओं की केंचुल काट कर एक तरफ फ़ेंक दी. लगा... कोई उसके पीछे खड़ा पूछ रहा है सर , आपको किससे मिलना है ? " मिसेज मालविका इसी कोठी में रहती हैं," - उसे नीचे से ऊपर तक घूरते हुए पूछा.
" हाँ ", लेकिन आप कौन हैं ? बड़े ही अटपटे ढंग से उस व्यक्ती ने पूछा था।
"देखिये , मैं उनके घर से आया हूँ", मुझे जरूरी काम के तहत मिलना है।"
घर का नाम सुनते ही उसने अपने पीछे आने का इशारा किया. और वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा . मेन दरवाजे पर पहुंचते ही उसने कालबेल के पुश बटन को दबाया. दरवाजा किसी बूढ़ी औरत ने खोला था. बूढ़ी औरत को देखते ही उस व्यक्ती ने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा,"मांजी ! ये सज्जन बहूजी के घर से आए हैं और उनसे मिलना चाहते हैं."
बूढ़ी औरत ने हाथ के इशारे से अन्दर जाकर बैठने को कहा तथा जोर से आवाज दी ,"बहू !आपसे कोई मिलने आए हैं."
"अभी आती हूँ" की आवाज से वह फिर बुरी तरह चौंक गया। आवाज जानी पहचानी सी लगी। कहीं? ये निशा तो नहीं? लेकिन यह कैसे हो सकता है दो नामों से जुडी युवती कहीं एक तो नहीं है. अगर यह निशा है तो फिर मालविका कौन?
लेकिन निशा ऐसा कार्य क्यों करेगी. उसे किस चीज की कमी है. ये निशा नहीं हो सकती है. जरुर उसे भी गलतफहमी हो गयी है.
"सर, यह तो मालविका का ही फोटो है". जब तक वह संभल पाटा. एक आवाज उसके कानों से दुबारा टकरा ईको करने लगती है.
"कहिये !" के साथ ही एक युवती दरवाजे पर खड़ी, शालीन मुस्कराहट के साथ, उसका स्वागत कर रही थी.
उस युवती को देखते ही वह , अब पूरी तरह से धुंआ-धुआं होने लग गया था. सिर्फ इतना ही कह सका,"आप!"
"मेरा नाम मालविका है." कुछ सकपकाते हुए उसने कहा. "लेकिन"?
उत्तर देने की बजाए वह हवलदार रामसिंह को बड़ी पैनी निगाह से घूरने लग गयी थी. उसके चेहरे पर हवाईयां उडती हुई दिखाई दे रही थी. वह जब तक हवलदार रामसिंह को चुप रहने का ईशारा करता हुआ मालविका उर्फ निशा नाम की उस युवती ने एक मिनट कह - अन्दर चली गयी. तभी उस बूढी औरत ने कमरे में प्रवेश किया. अन्दर आते ही कहने लगी,"अरे ! बहू नहीं आई अभी तक ." और उसके साथ ही बहू को आवाज दी.
"मैं चाय बना रही हूँ मेहमानों के लिए। अन्दर से घुमड़ती हुई मालविका की आवाज आती है.
अब इस बात का कतई संदेह नहीं रह गया था कि वह निशा ही है. लेकिन ... कई घुमावदार सवाल मस्तिष्क के दालानों में से गुजरते हुए चीत्कार कर उठते हैं.
तभी एक भयानक चीख पूरी कोठी में व्याप्त हो जाती है. और सब तेजी के साथ रसोई घर की तरह दौड़ पड़ते हैं. जहां मालविका उर्फ निशा लम्बी हिचकी के साथ अंतिम सांस तोड़ देती है. उसकी आँखों के सामने धुंए का बहुत बड़ा गुबार पूरी रसोई में तीखी गंध के साथ फैल कर उसके सारे सवालों को अनुत्तरित छोड़ जाता है.

लगा, जिस निशा को वह बरसों से जानता है वह तो कब की मर चुकी है. यह निशा नहीं हो सकती हाँ, मालविका जरुर हो सकती है. कभी लगता, कहीं एक कफन में दो मुर्दे तो नहीं फूँक दिए गए हैं.

यह सब सोच - सोच कर वह, अन्दर तक घृणा, क्रोध तथा पश्चाताप की भावना से भर उठता है. हवा एक बार फिर तेज हो उठती है जो लगातार कटखनी कुतिया की तरह आज भी उसका पीछा कर रही है. जिसके स्पर्श मात्र से कभी वह रोमांचित हो जाया करता था . यही वो क्षण होते हैं जहां यादें स्मृति की तलहटियों में पदचाप करती हुई जिन्दगी को अबूझ सिरों को सायास ही अंधेरी घाटियों की ओर धकेल कर आदमी को तमाम जागृत अहसासों के मध्य निपट अकेला छोड़ जाती है. और वह.... लगातार उन्हीं रहस्यमई घाटियों में उलझता हुआ खामोशियों के फैले घेरों में और खामोश होता चला जाता है, शायद .....

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Wednesday, 11 August 2010

अशोक आंद्रे

घर की तलाश

मुद्दतों के बाद लौटा था वह
अपने घर की ओर,
उस समय के इतिहासिक हो गए घर के
चिन्हों के खंडहरात
शुन्य की ओर ताकते दिखे प्रतीक्षारत .
उस काल की तमाम स्मृतियाँ
घुमडती हुई दिखाई दीं ,
हर ईंट पर झूलता हुआ घर
भायं-भायं करता दीखा,
दीखा पेड़ , जिसके नीचे माँ इन्तजार करती थी
बैठ कर
शाम ढले पूरे परिवार का .
उसी घर के दायें कोने में पड़ी सांप की केंचुली
चमगादड़ों द्वारा छोडी गयी दुर्गन्ध
स्वागत का दस्तरखान लगाए मिलीं ,
जबकि दुसरे कोने में
मकड़ी के जालों में उलझी हुई
स्मृतियों के साथ
निष्प्राण आकृतियाँ झूल रही थीं
घर के आलों में भी काफी हवा भर गयी थी
जिसे मेरी सांसें उनसे पहचान बनाने की
कोशिश कर रही थीं,
हाँ, घर की टूटी दीवार पर लटकी छड़ी
बहुत कुछ आश्वस्त कर रही थी
टूटे दरवाजों के पीछे
जहां कुलांचें भरने के प्रयास में जिन्दगी
उल्टी- पुलटी हो रही थी,
उधर आकाश चट कर रहा था-
उन सारी स्थितियों को
जिन्हें इस घर की चहारदीवारी में सहेज कर
रख गया था
इड़ा तो मेरे साथ गयी थी
लेकिन उस श्रद्धा का कहीं कोई निशान दिखाई
नहीं दे रहा था
जिसे छोड़ गया था घर के दरवाज़े को बंद
करते हुए,
अब हताश, घर के मध्य
ठूंठ पर बैठा हुआ वह
निर्माण के सारे तथ्यों को ढूंढ रहा था,
जिसका सिरा बाती बना इड़ा के हाथ पर
जलते दीये में ही दिख रहा था,
बीता हुआ समय कल का अंतर बन कर
खेत में किसी मचान सा दिख रहा था
जिस पर बैठ कर
सुबह का इन्तजार कर रहा था वह
ताकि घर को फिर अच्छी तरह टटोलकर
सहेजा जा सके .



सपने

सपने हैं कि पीछा नहीं छोड़ते
हर रोज अजीबोगरीब सपनों का
सहारा लेकर
अनगिनत सीढ़ियों को घुटनों के बल
विजीत करने की कोशिश करता है वह,
यह व्यक्ति की फितरत हो सकती है
जो,उसे आकाश में भी सीढ़ियों का
दर्शन करा देती है.
सीढ़ियों पर खड़ा व्यक्ति
अपने से नीचे खड़े व्यक्ति को
उसके शास्त्र से जूझने को कहता है.
एक सीढ़ी, दो सीढ़ी पहाड़ तो नहीं
बन पाती है.
हाँ उसके व्याख्यायित आख्यानों का
विस्तार जरूर होती है.
उसी विस्तार को छूने के लिए
वह भी सपनों को विस्तार देता है
और घुटनों में ताकत देता हुआ
अपने अन्दर ही
छू लेता है उन सपनों को.

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Friday, 25 June 2010

अशोक आंद्रे

एकांत

शहर से निकल कर, वह सुनसान घने जंगल की तरफ चल पड़ा . किसी डरावने परिवेश में लिपटी हुई जंगल की खामोशी उसे आमंत्रित कर रही थी. जंगल, जहां छोटे-बड़े पेड़ों की विशाल फौज और उनके नीचे किसी अनबूझ पहेली की तरह बेतरतीबी से बिछी हुई हरी-भरी घास . उनके पैर गतिवान थे किसी अजनबी अज्ञात की ओर .
अचानक अट्टहास का क्रूर स्वर .
पैर ठिठक गए .जीवन के सभी प्रश्न एक साथ विस्मय से चीख उठे , " कौन है"?
फिर अट्टहास.
घबराहट ने थोड़ी हिम्मत बटोरी - " कौन हंस रहा है", इस एकांत में ? सामने क्यों नहीं आता .
"मैं" मैं वही हूँ जिसकी तलाश में तुम अज्ञात में पलायन कर रहे हो ".
" क्या मतलब ?"
" मैं हूँ एकांत" .
" लेकिन तुम इतने क्रूर, इतने डरावने क्यों लग रहे हो"?
" अंत हमेशा डरावना ही लगता है. तुम एक अंत की ओर ही तो बढ रहे हो. जीवन के प्रश्नों से भाग कर , एकांत का उत्तर खोजने वाला राही एक डरावने अंत से अधिक कुछ नहीं पा सकता.
" नहीं ....नहीं, मैं अंत नहीं चाहता .....मैं अंत नहीं चाहता ....मैं जीवन चाहता हूँ.....
और वह उल्टे पैरों जीवन के प्रश्नों की ओर लौट पड़ा .


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A REVERIE - by ashok andrey

Great silence of trembling darkness at evening
Melts in the chores, scattered in my surrounding.
So-called "extract" of my trembling dreams
Remains untouched to the shadows of eternal thoughts,and
Chases me in the emotions of frozen past.
shapeless echoes over great eclat.

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