Friday, 31 August 2018

अशोक आंद्रे

शब्द

खोज करते शब्द
फिसल जाते हैं अकसर  चादर  ओढ़
तैरने की नाटकीय कोशिश करते
समय की लहरों पर
लहराते परों की लय पर
संघर्षों का इतिहास बाँधने लगते हैं सब
फिर कैसे डूबने लगते हैं शब्द ?
साहिल की दहलीज पर
उड़ेलते हुये भावों को
पास आती लहरों को
छूने की खातिर-
जब खोजने लगता है अंतर्मन
तह लगी वीरानियों में
क्षत-विक्षत शवों की
पहचान करते हुये,
मौन के आवर्त तभी
खड़खड़ाने लगते हैं जहाँ
साँसों के कोलाहल को
धकेलते हुये पाशर्व में
खोजता है तभी नये धरातल
चादर खींच शब्दों की
करता है जागृत
शायद शब्दों को अनंत स्वरूप देने के लिये
ताकि भूल होने से पहले
वर्तमान को भविष्य की ओर जाते हुये
नई दिशा मिल सके
शब्द को.
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Wednesday, 20 March 2013

अशोक आंद्रे

विनाश (लघु कथा )
पूरा आफिस सन्नाटे में सिमटा हुआ था। यहाँ तक की दरवाजों और खिडकियों पर लटके पर्दों के हिलने की

आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
राशनिंग का आफिस और सन्नाटा।
दोनों का मिलन कम से कम वहां सबकी समझ को भ्रमित कर रहा था।
आफिस में सब एक दूसरे की आँखों में झांकते हुए खामोश खड़े उस सवाल का अर्थ ढूंढ रहे थे।
तभी कमरे की दाई ओर बैठे सर्कल इन्स्पेक्टर के पास दहाड़ती हुई एक आवाज सुनाई पड़ी। उसके सामने खड़ा

एक फौजी आफिसर कमरे के सन्नाटे की चिंदी-चिंदी कर रहा था। विशाल बाबू के कदम न चाह कर भी कारण

जानने कीउत्सुकता में उस ओर बढ़ गए थे।
फौजी आफिसर अभी भी उसी टोन में दहाड़ रहा था,"मैं ......मैं, पिछले दस दिन से आपके आफिस के चक्कर

लगा रहा हूँ। लेकिन जनाब हैं कि इनसे काम होना तो दूर, इनके दर्शन भी दुर्लभ हैं।"
सर्कल इन्स्पेक्टर चुपचाप फौजी आफिसर को घूरे जा रहा था।
"जब भी जनाब के लिए पूछताछ की,साहब किसी इन्क्वारी के लिए गए हैं। और ......और आज इनका मूड नहीं

है।कभी आप लोगों ने सोचा है कि, अगर हमारे देश पर किसी विदेशी ने आक्रमण कर दिया ........ उस वक्त हम

भी ......."
आसपास के लोगों पर नजर डालते हुए फौजी आफिसर कह रहा था, " हाँ सोचो ! हम भी जेबों में हाथ डाले ......

कहने लगें कि .......कि हमारा भी आज मूड नहीं है। जानते हैं आप ....इसका क्या अर्थ होगा .....विनाश।"
हम सभी की आँखों में फौजी अफसर का सवाल तैर उठा था ....विनाश ....महाविनाश।
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Tuesday, 19 February 2013

अशोक आंद्रे

द्रोपदी की बटलोई ( लघु-कथा )

 
एक बुद्धिजीवी न जाने किस धुन में बहुत तेज गती से चला जा रहा था। अचानक उसकी दृष्टि सड़क पर पड़े एक जीर्ण-शीर्ण बर्तन पर जाकर रुकी।
उसने उसे उठा कर अपनी बुद्धि पर जोर दिया-"ओह,यह तो शायद द्रोपदी की बटलोई है।"
वह खुशी से पागल हो गया और अपनी खोज पर गर्व करते हुए,नए चमत्कार का सूरज चमकाने के लिए शहर की ओर भागा। किन्तु समय की ऊबड़-खाबड़ सड़क
पर उसके अनियंत्रित क़दमों ने ऐसी ठोकर खाई कि धराशायी हुए उठ सकने की क्षमता खो बैठने वाले शरीर से बटलोई काफी दूर जाकर गिरी।
उधर विपरीत दिशा से अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए बढ़ रहे अन्धकार ने धीरे-धीरे सारे दृश्य को अपनी अनंत काली चादर से ढक दिया।
तब से आज तक न तो उस बटलोई का पता चला और न बुद्धिजीवी का ही।
हाँ, और बहुत से बुद्धिजीवी उसी दिशा की ओर जाने के लिए अग्रसर जरूर हैं।
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Monday, 7 January 2013

अशोक आंद्रे

टी वी से पोषित होते हमारे धार्मिक तथ्य (लघु-कथा)
भीड़ - भाड़ से दूर विदुर - कुटी अपने आप में रम्य स्थान होने के बावजूद अपने दुर्दिन को जीती हुई दिखाई को जीती हुई दिखाई दे रही थी।
बहुत चर्चा सुनी तथा पड़ी थी मैंने। महाभारत का एक बहुचर्चित पात्र उपेक्षा के बोध से ग्रसित, अपने अंतिम समय तक वहीं कुटिया बना
आत्मचिंतन में लीन हो गया था। मानो सारा संसार मिथ्या के भ्रम-जाल में फंसा दीख रहा था उसे। सच्चाई जिसकी जिव्हा पर हर समय
विराजती थी कभी, आज जड़ हो उसी धरती पर मौन हो गयी थी।
ऐसे महान व्यक्ति की भक्ती - स्थली को देखने के लिए , एक लम्बे सफर के उपरान्त पहुंचा था पत्नी के साथ। कई सवाल उछाले थे उस
तक। पता नहीं क्यों सारे सवाल निरुतर हो लौट आए थे हम तक।
मन खीझ उठा था। अशांत विक्षोभ सा। पूछने पर पता चला कि वह गत दो वर्षों से वहां कार्यरत है।
उधर पुजारी शांत भाव से मंदिर की जानकारी के साथ-साथ विदुर के बारे में बता रहा था। ठीक पीछे साठ की गिनती गिनता हुआ एक
बूढ़ा व्यक्ति अपनी अनभिज्ञता को शीर्ष पर पहुंचा अस्पष्ट शब्दों में फुसफुसा रहा था .......
"बाबू जी, आप काहे को परेशान हो रहे हो, कल टी . वी . पर महाभारत आएगा ही। आपको विदुर जी के बारे में बाकि की सारी जानकारियाँ
मिल ही जाएँगी।"
मैं, पत्नी के साथ इस जानकारी पर अवाक हुए बिना नहीं रह सका। और उसके द्वारा दी गयी जानकारी पर मन ही मन खिन्न होता हुआ
मंदिर की सीढ़ियाँ उतरने लगा था।
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Monday, 30 May 2011

अशोक आंद्रे

दूसरी मात

दिन की आँख खुलने से पहले ही चिड़ियों की चहचहाहट ने रतन की नींद को पूरी तरह से उचाट दिया था. कुनमुनाते हुए रजाई को एक तरफ धकेल, अंगड़ाई से शरीर
में फुर्ती का एहसास महसूसा था रतन ने. रात्री का टुकड़ा भर अँधेरा अभी भी कमरे की कैद से छूट
नहीं पाया था. चारों तरफ निगाह दौडाते हुए रतन ने अपने को एक बार फिर नितांत अकेला पाया
मन को कहीं अतीत के सहारे और वर्तमान को आँखों में सहेजे उसने जैसे ही दरवाजे के कपार खोल
बाहर के वातावरण को सूंघना चाहा, हवा का सर्द झोंका पूरे कमरे में आतंक फैला गया.
हुं ! यह भीकोई जिन्दगी है, पूरे मौसम को कोसते रहो एक कप चाय की इन्तजार में.अपने पड़ोसी
रामलाल को देखो जिसकी पत्नी आँख खुलने से पहले चाय के साथ मान- मनुहार करती हुई उसे दिनके उजाले काएहसास कराती है." समय बिताने का कितना अच्छा तरीका है स्वयंसे बातें
करनाऔर उन बातों का जिनका न आदि हो और न अंत. दुमुंही की तरह. चाहे जिधर से पकड़ लो चाहे जिधर पहुँच लो.
काफी समय बीत चूका था. रतन सन्यासी की सी लीं मुद्रा में बैठा रहा.
रजाई से हाथ निकाल धीरे से तकिये के नीचे, रतन का हाथ कुछ टटोलने लगा. घड़ी के रेडियम
के सहारे दो सलाइयों के बीच समय को मापने की कोशिश की. वक्त साढ़े पांच का ही था.
चाय की तलब एक बार फिर नन्हे खरगोश की तरह रतन के भीतर
कुलांचे भरने लगी . न चाह कर भी उठना पड़ा उसे. सर्दी में उठकर चाय बनाने का खौफ उसके मुंह
का स्वाद कसैला कर गया. अन्दर का आक्रोश गर्म लावे की तरह फूटने लगा.
तभी एक बारीक चीख ठंडे मौसम को आहत करती हुई उसकी रजाई पर
छा जाती है. पड़ोसी रामलाल कंठ - फोडू स्वर में चीख रहा था-" तू औरत नहीं....सूखी बावडी
है, तभी तो...."
कुछ प्रतिवाद किया था नारी कंठ ने. रामलाल की गर्जना पुन: उभरी थी -
"नंदी क्या असत्य बोलेगा ?"
रजाई को अपने चारों ओर कसते हुए रतन ने सोचा क्या बाँझपन केवल नारी का ही दोष हो सकता है. दोष रामलाल में भी तो हो सकता है. आज आदमी
ब्रहम्मांड को छूने लगा है. जबकि आम हिन्दुस्तानी अभी भी सारा दोष औरत पर मढ़ कर ही
चैन की नींद सोने की कल्पना संजोये अपनी मर्दानगी बखानता रहता है.
रतन को याद आया कि हाल ही में रामलाल के घर के सामने एक
आदमी बैल के साथ खडा लोगों के भविष्य को बता रहा था.और उसका दावा था कि कोई भी
आदमी, बैल द्वारा बताए गए भविष्य को चुनौती नहीं दे सकता. वह भविष्यवाणी को गलत साबित करने वाले को एक हजार का इनाम देगा.
उसकी इस बात ने लोगों के दिल पर काफी गहरा असर किया था.
उसी भीड़ के बीच खड़े रामलाल ने भी अपना सवाल उस बैल के
सामने रखा था. बैल ने सवाल सुन कर अपना सिर नकारात्मक मुद्रा में हिला दिया था. रामलाल
सन्नाटे में आ गया था. तभी तो रामलाल इस वक्त अपनी पत्नी को इस कदर दुत्कार कर
उसे 'सूखी बावड़ी' कह रहा था.

बैल वाला शहर के बाएं कोने में अपनी एक जवान लडकी के साथ रहता था. परिवार के नाम पर सिर्फ यही लडकी थी. जिसे पत्नी ने मरते वक्त इकलौती धरोहर
के रूप में उसके पास छोड़ा था. पत्नी की मौत ने उसे बुरी तरह से तोड़ कर उसके पूरे अस्तित्व
को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित कर दिया था.
मौत से कुछ दिन पहले उसकी पत्नी ने एक दिन नंदी से
पूछा था चुपके से,अपनी जिन्दगी की चुकती सांसो के बारे में. लम्बी बीमारीनेउसके शरीर
को पुराने खंडहरों में तब्दील कर दियाथा. शरीर का आधा हिस्सा लकवे का शिकार हो
गया था.
बैल वाले को पूरी उम्मीद थी कि उसकी पत्नी जरूरत
वैद्यजी के द्वारा दी गयी जड़ी- बूटी से पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी . और फिर .... उसका घर.....
एक दिन ...हरी बगिया की तरह महकने लगेगा. लेकिन ....नंदी की बात को झुठला नहीं
पाया था तब. और समय अपनी रफ्तार बढाता हुआ कब खिसक गया. पता ही न चला .

कभी नंदी की पूंछ से खेलती नंगे पांव चलती उसकी बेटी
भी साथ होती थी. बेटी के बड़े हो जाने पर वह अब नंदी के साथ अकेला जाता है.
लडकी को अगर साथ ले चले तो लोग अपने भविष्य और
भाग्य से ज्यादा लडकी में रुची लेने लगेंगे, यह वह जानता है.
शाम अक्सर बौराए मन की तरह उसके खाली समय में
तरंगित हो उठती, जब वह भांग का अंटा चढ़ा लेता था. तब उसकी मस्ती उसके स्व को छूती
हुई आसपास के पूरे माहौल को जिन्दादिली का एहसास कराती. कई बार वहां से गुजरते हुए
रतन ने स्वयं अपनी आँखों से यह देखा तथा महसूसा था.
इस बैल को वह अपने सगे लड़के की तरह प्यार उसका
पूरा विश्वास था कि उसका बैल उसी नंदी का अवतार है जिसकी जिह्वा पर ब्रह्मा का वास था.
इसीलिए उसने इसका नाम नंदी रख छोड़ा था.
खाली समय में कई बार अपनी जवान हो आई बेटी का
भविष्य इसी बैल से बचवाता था. पूरा विश्वास था उसे कि उसकी बेटी का विवाह किसी राजकुमार से होगा. जब-जब इस सवाल को उसने कागज के चंद टुकड़ों के सहारे बैल के
पैरों की तरफ उछाला , उसने हर बार राजकुमार वाले कागज़ को ही अपने खुर से दबाकर उसके
विश्वास को पुख्ता किया था.

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काफी समय बीत गया था बस स्टाप पर खड़े हुए. घड़ी
देखी. करीब एक घंटा गुजर चुका था. दूर-दूर तक बस के आने के निशाँ तक सड़क पर से गायब
थे. 'कहीं बस की स्ट्राइक तो नहीं हो गयी है.' उसने अपने आप से पूछा .
दिल्ली जैसे महानगर में इस तरह की घटनाएँ बिना पूर्व
सूचना के अक्सर घट जाया करती हैं.
आसमान पर छितराए बादल इकठ्ठा होने लगे थे. आज दिनभर गर्मी भी काफी रही. कल ही तो टी.वी. पर हिंदी समाचार के अंत में कहा गया था कि
कल आंधी के साथ गरजकर छींटे पड़ने की संभावना है.
खैर ! आंधी के आसार तो नजर नहीं आ रहे थे. लेकिन
बारिश के आसार जरूर नजर आ रहे थे.
बस स्टाप पर कुल तीन सवारियां ही बस का इन्तजार
कर रही थीं अब. महिला सवारी बार-बार घड़ी देखती तथा माथे पर तिर आए पसीने को दूसरे हाथ
में पकड़े रूमाल से पोंछने का प्रयास करती. वह शायद आज पहली बस पकड़ने से वंचित रह गयी
लगती थीं. उस महिला के स्थान पर रामलाल की पत्नी का स्वरूप प्रतिबिंबित होकर उभरने लगा
था. न चाह कर भी उस दिन की सुभह की घटना को भुला नहीं पा रहा था. पता नहीं क्यों नारी
ही हर बुरी स्थिति को भोगने के लिए अभिशप्त है.
कई बार नारी ही नारी की दुश्मन होती है. कई बार रामलाल
के पड़ोस में रहने वाली औरतों ने कटाक्ष किये थे. रामलाल उन व्यंग वाणों को सुनकर तिलमिला जाया करता था. उसी आक्रोश की प्रतिक्रिया ही तो थी उस दिन. दस महीने पहले सुने शब्द इस
वक्त उसके कानों में 'सूखी बावड़ी' बन कर गूँज रहे थे.
अब अन्धेरा काफी तिरने लग गया था. बस का अभी भी कुछ
अता-पता नहीं था.
चार किलोमीटर की दूरी पर ही तो घर है, रतन ने जैसे खुद को ललकारा और खरामा-खरामा चल पडा. थोड़ी दूर पैदल चलने पर उसे चने बेचने वाला दिखाई
दिया. एक रूपये के चने लेकर वह बढ चला.
अब हवा में काफी नमी थी. बादल काफी घिर आए थे.
लगा, बरसात जरूर होकर रहेगी.
दो- ढाई किलोमीटर चला होगा कि वर्षा टूट पडी.काफी
देर तक एक पेड़ के नीचे रुक कर वह बरसात थमने का इन्तजार करता रहा. लेकिन बरसात
थमने के आसार नजर नहीं आ रहे थे.
अब तक वह काफी भीग चुका था. पेड़ के नीचे और
रुके रहने का कोई औचित्य उसे नजर नहीं आया. वह एक बार फिर पैदल चलने का संकल्प
लेकर चल पड़ा .
बस्ती के करीब पहुंचने तक अन्धेरा काफी हो चला था.अब बरसात भी रुक-रुक कर हो रही थी. बस्ती की झुग्गियों में से धुआं रिसता भी दीख
रहा था. काफी भीड़ जमा थी. बाईं तरफ से दूसरे छोर की झुग्गी केबाहर जहां पुलिसवालों ने
झुग्गी को चारों ओर से घेर रखा था. हर आने वालों को पुलिस वाले सशंकित नजरों से देख
रहे थे. झुग्गी के अन्दर अँधेरा होने के कारण कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.
- "यह तो उसी बैल वाले की झुग्गी है." उसने
अपने आप से सवाल किया.
वहीं एक कोने पर, वही बैल वाला आदमी दहाड़
मार-मार कर चीख रहा था. ठीक दूसरे कोने पर खूंटे से बंधा बैल खामोश निगाहों से अपने
बिलखते मालिक की तरफ देख रहा था.
"क्या हुआ भाई !" मैंने पास खड़े एक आदमी से
पूछा. होना क्या है बाबूजी ? गरीब आदमी की तो कोई इज्जत ही नहीं रही इस संसार में.
किसी का भला क्या बिगाड़ा था इस आदमी ने ? उसने बैल वाले की की इशारा करते हुए
कहा.
"मैं आपकी बात समझा नहीं," उसने बैल वाले की
तरफ देखते हुए कहा जो अब बदहवास सा आँखे फाड़े सबको देख रहा था.
......
उसने एक बार फिर उस आदमी की तरफ देखा
जिसने अस्पष्टता की तलहटी में फ़ेंक बुरी तरह उलझा दिया था उसे. आसमान में बादल जरुर
छितरा कर इधर-उधर फैल गए थे किन्तु रतन का सवाल अभी भी सुलझ नहीं पाया था.
उस भीड़ को ठेल, थोड़ी सी जगह बना कर झाँकने
की कोशिश की लेकिन भीड़ ने उसे फिर वापस उसी बिंदु पर पहुंचा दिया.
प्रस्थान बिंदु पर पहुंच कर, उसी आदमी को दोबारा
टटोलने की कोशिश की. बार-बार सवाल करने पर वह आदमी काफी झुंझला गया .
" जरा आगे बढ कर स्वयं ही देख लो. क्या हुआ है?"
"मेरा मतलब यह है कि.....आखिर हुआ क्या है?" किसी की इज्जत दिन दिहाड़े लुट जाए और
आप कहते हैं कि माजरा क्या है? इसकी जवान लडकी की दिन-दिहाड़े इज्जत ..... घृणा का
गाढ़ा सैलाब अब उसके चेहरे पर फैल गया था.
लगा, ठीक ही तो कह रहा है यह. मस्ती से भरे
शांत जीवन में कोई ज़हर घोल दे और सब चुपचाप देखते रहें. मन काफी उदास हो गया. बरसात
की फुहारों से भीगी ठंडी हवा आग के शोलों सी लग रही थी उसे अब.
उस आदमी का विश्वास तड़क कर पैरों में घाव करने
लग गया था. जिन्दगी भर जो दूसरों के भाग्य बताता रहा, आज स्वयं भाग्य रूपी भंवर में फँस
कर चारों खाने चित पड़ा कराह रहा था . सान्तवना का एक भी शब्द उसके लिए बेमतलब सा लग
रहा था उसे.
रतन ने देखा सामने से रामलाल तेजी से भागता चला आ रहा था. उसके चेहरे पर अद्भुत चमक तैर रही थी. मन आशंका से भर उठा उसे देख कर. उसने कहीं.....
पत्नी को...... जिज्ञासा को दबाते-दबाते भी पास आने पर, बांह पकड़ पूछ ही डाला था रतन ने-अरे ,
भाई रामलाल, क्या बात है?"
"भाई साहब , मैं जरा जल्दी में हूँ . अभी आकर
बताता हूँ. जरा दाई को लेने जा रहा हूँ." इतना कह कर वह तेजी से चला गया.
रतन अब नंदी को देखने लगा था. बैल खामोश
निगाहों से शुन्य में घूर रहा था. पता नहीं उन निगाहों में रामलाल की पत्नी के लिए 'हाँ' थी
या फिर न!
धीरे-धीरे सधे क़दमों से उसकी तरफ चला आया
था रतन. नंदी रुपी बैल ने एक बार उसको देखने के उपरान्त खिन्नता का बोध लिए नकारात्मक
मुद्रा में अपना सिर हिला दिया. शायद उसने रामलाल की बात सुन ली थी जिसे कभी उसने संतान
के सुख से वंचित रहने का संकेत दिया था और ....आज वह .....अपने मालिक की पुत्री की मौत
को भी पचा नहीं पा रहा था.
पता नहीं चूक कहां हुई थी. लेकिन रतन इन
सारी परिस्थियों को देख कर काफी असहज हो उठा था. जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल उसने
एक सिगरेट सुलगाई थी. उसका धुंआ चारों तरफ फैले अँधेरे को और सघन कर रहा था. वहां
खड़ा रहना भी रतन के लिए असंभव प्रतीत हो रहा था. धरती और आसमान उसे घूमते नजर
आ रहे थे.
एक निग़ाह चारों तरफ डाल रतन अपने
घर की ओर चल दिया था जहां रामलाल के कमरे में नन्हा- सा जीवन चीख-चीख कर अपने
अस्तित्व का बोध करा कर नंदी को दूसरी मात दे रहा था.

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Wednesday, 19 January 2011

अशोक आंद्रे

और वह

ठीक दस साल के अंतराल के बाद अपने शहर लौट रहा था वह. यह शहर उसका अपना था . जहां उसके जीवन के बीस बसंत हँसते- खेलते एक दिन अचानक ही विदा हो गए थे . बाबू को उसके खेलों से काफी चिढ होती थी . अक्सर खेल के मैदान से लौटने के उपरांत उसकी पिटाई भी हो जाती थी. बाबू चाहते थे कि सारा-सारा दिन खेलने की बजाए वह कुछ पढाई में ध्यान लगाए . लेकिन उसके मन को खेलने के सिवा और कुछ सुहाता ही न था . और खेल-खेल में ही तो वह कब जवानी की देहलीज पार करता हुआ निशा से जा टकराया था . पता ही न चला . निशा उसके पडोस में रहती थी . याद आते ही मन काफी उदास हो उठा था . हवा तेज थी . सड़क के किनारे लगे हुए पेड़ों के पत्ते भी हवा के झोंको के साथ सरसराहट की आवाज करते हुए, उसके कदमों को तेज चलने के लिए उकसाने लगे .
इन्हीं पेड़ों पर वह कितनी बार चढ़ा - उतरा है निशा के कहने पर । कितना अच्छा
लगता था पेड़ों पर फैले घने पत्तों की सरसराहट के बीच से अनायास ही निशा को निहारते रहना . वह भी उसे घूरते देख जोरों से खिलखिला उठती थी. तब वह सिर्फ झेंपकर दूसरी ओर ताकने लग जाता था.
कितना अजीब लगता है आज सोचने पर, गाँव का निपट बेवकूफ - सा दिखने
वाला लड़का , पुलिस इंस्पेक्टर के पद को सुशोभित कर रहा है। बापू तो खुशी से फूले नहीं समाए थे। गाँव भर मे बूंदी के लड्डू बांटे थे। गर्व से अपने सीने को दुगना फैला कर मूंछो का ताव देते हुए, हर मिलने वाले के सामने प्रशंसा में शब्दों का भण्डार खोल देते. लेकिन माँ........
वह अक्सर डरी - डरी सी रहने लगी थी. पुलिस की भी कोई नौकरी होती है ?
हर वक्त एक बदनाम चेहरा नकाब की तरह ओढ़े फिरो . कोई खुल के बात भी नहीं करता है. जिसे देखो , डरा हुआ - सा कन्नी काटने को आतुर दिखता है. लेकिन माँ को कैसे समझाता कि आखिर पेट भी तो कोई चीज होती है. जिसके लिए कोई न कोई नौकरी तो करनी ही पड़ती है.
लगा, हवा फिर तेज हो गयी है. अन्धेरा भी कुछ ज्यादा ही घिर आया है. सर्दी की
रातें लम्बी और गहरी होती हैं ना, इसीलिये पेड़ों के पीछे से कई भूतिया चेहरे उभरने लगते हैं. उन चेहरों के पीछे एक चेहरा जाना पहचाना - सा लगता है.
पिछले साल कि तो बात है. जब उसे हेडक्वार्टर पर उसे बुलाया गया था . मौसम
भी इसी तरह करवटें बदल रहा था उन दिनों . मन किसी काम में न लग कर कमरे में बंद हो जाने को हो रहा था.
ठीक उन्हीं क्षणों में उसके अन्दर के पिघलते एहसासों को किसी ने दरवाजों की
सांकल बजाकर , ध्यान भंग किया था . अन्दर ही अन्दर कुढ़ते हुए दरवाजा खोला था उसने. बाहर कोतवाली से आया हवलदार शमशेर सिंह खडा था . उसे देखते ही झट , सैल्यूट ठोककर कोतवाली में हाजिर होने का परवाना थमा दिया था, उसके हाथ में.
तब वह वर्दी पहनकर , उसी के साथ कोतवाली के लिए रवाना हो गया था . रात के ग्यारह बज रहे थे. कोतवाली सन्नाटे की रजाई ओढ़े शांत दीख रही थी. मन में आशंका कुलबुलाने लगी थी. कहीं .....
कोतवाली की दाईं ओर मोटर गाडी खडी करके, अपने कमरे की तरफ मुड़ गया था . सामने उसका अर्दली कमरे के बाहर बैठा ऊँध रहा था. उसकी पदचाप को सुन वह हडबडाकर उठ खडा हुआ.
एक गिलास पानी पीकर , बड़े साहब के कमरे की तरफ चल दिया था वह. जहां बड़े साहब अपनी मेज पर झुके फाईलों के अन्दर बड़ी तल्लीनता से कुछ खोजते हुए दिखे.

धीरे से पर्दा हटा , उसने पहुंचने का संकेत दिया था. बड़े साहब ने उसे देखते ही
बैठने के लिए कहा तथा कुछ पेपर्स सामने रखते हुए कहने लगे- देखो ! तुम हमारे पुलिस विभाग में सबसे ज्यादा समझदार तथा योग्य व्यक्ति हो इसीलिये मैं तुम्हें यह काम सौंप रहा हूँ । आजकल हमारे शहर में तस्करों का बहुत बड़ा गिरोह सक्रिय है. उस गिरोह में एक विशेषता है कि वे अपने सारे कार्य किसी न किसी युवती के माध्यम से कराते हैं . ऐसी ही एक युवती मालविका है जो शहर में इस गिरोह के लिए कार्य कर रही है. लेकिन इस युवती पर हाथ डालना इतना आसान नहीं है. जरा होशियारी से काम करना होगा. अगर तुम इस युवती को किसी तरह से काबू कर सको तो समझ लो बहुत बड़ा किला फतह कर लोगे . फिर उसका हुलिया बताते हुए मुस्कराकर मेरी ओर देखते हुए कहने लगे- इसमें पदोन्नति के भी चांसिस हैं.
पिछले हफ्ते ही की तो बात है जब हैडक्वाटर की सूचना पर तस्करों के एक
गिरोह का पीछा कर रहा था । हवलदार शमशेर सिंह भी उसके साथ था। जो उस युवती के बारे में सही-सही जानकारी रखता था। लेकिन लम्बी दौड़ धूपके बावजूद वह युवती उसकी आँखों में धूल झोंककर गायब हो गयी थी।वह सिर्फ हाथ मलता रह गया था उस दिन।
साहब अभी भी उससे कुछ कह रहे थे. और वह उनकी हिदायतों पर गौर करता
हुआ अन्दर ही अन्दर प्लान बना रहा था. और विशवास की एक परत उसकी आँखों के सामने फैल गयी थी.
उसने चुपचाप उन पेपर्स को फाइल के साथ उठाया और अपने कमरे की तरफ
चला आया और फिर वह सीधे अपने कमरे की तरफ चला आया जहां बैठकर फिर नये सिरे
से उन फाईलों को उलटने-पलटने लग गया था. अचानक एक फाइल के पेज नं उन्नीस पर उसकी निगाह पड़ गयी. जहां कुछ चौंकाने वाली बात अविश्वास के गलीचे पर उठ खडी हुई थी.

उसे याद आया एक दिन वह बाजार में कुछ खरीदारी कर रहा था ठीक उसी वक्त
निशा से मुलाक़ात हो गयी थी. निशा शायद जल्दी में थी. औपचारिक बातचीत के दौरान ही निशा ने उसे घर आने का निमंत्रण दे डाला था. जिसे सहर्ष ही स्वीकार कर विदा ले ली थी निशा से उसने.
यह वही पेज था जिस पर, मालविका नाम की युवती के बारे में बड़े विस्तार से
वर्णन किया गया था. कद ५"-२"उम्र तीस साल. और ...... शहर का नाम पढ़ते ही चौंक गया था.

ध्यान आया निशा भी तो उसी शहर की है. उसे बहुत बाद में पता चला था कि उसकी शादी किसी आर्मी आफिसर से हुए थी. लेकिन नामों में कोई तारतम्य न होने के कारण वह फिर उन्हीं फाइलों में खो गया था.
आज उसकी जिन्दगी में सबसे बड़ा इम्तहान हेने जा रहा था. लगातार कितनी मेहनत
करने के उपरान्त उस केस से सम्बंधित , मुख्या सूत्र उसके हाथ लग गया था. अब सिर्फ उस युवती को किसी तरह से पकड़ कर अपनी खोज को जारी रखते हुए, पूरे गिरोह को जेल के सींखचों के पीछे करना था. उन दिनों युद्ध स्तर पर कार्य किया था उसने. सारी कार्यवाही को गुप्त रखा गया था ताकि अपराधी को हवा भी न लग सके.
सवेरे उठते ही उसने हेडक्वार्टर को फोन करके दो नारी पुलिस कांस्टेबल के साथ पांच
अन्य सहयोगी मंगवाए थे . वे सभी सादे कपड़ों में आएं इस बात की ताकीद कर दी गयी थी .
शाम के छ: बज रहे थे. सभी सहयोगी निश्चित समय तक पहुंच चुके थे. सभी को ख़ास-ख़ास
निर्देश देने के बाद उसने भी सादे कपडे पहन लिए थे.
सर्दियों में शाम साढ़े छ: बजे के आसपास ही अँधेरे वातावरण में गहराने लगे थी. सड़कों
पर आम आदमी की चहल-पहल भी सिमट कर अपने घरों की चार दीवारी में कैद हो जाती है. वैसे भी पाश कालोनी में अक्सर सन्नाटे का सैलाब चहल कदमी करता दिखलाई देता है. इसीलिये उसने इस वक्त को चुना था ताकि सारी कार्यवाही बिना किसी झंझट के निबट जाए .
तभी सामने से एक आध कार हार्न बजाती हुई उसके निकट से निकल गई. पत्तों की सरसराहट भी उस वक्त चौकन्ना बने रहने के लिए पर्याप्त थी उसके लिए. हाँ ! दो चार कुत्ते जरुर भौंक कर उस
कालोनी के चारों ओर फैले वातावरण में जिन्दगी का एहसास करा जाते. तभी एक व्यक्ती साईकिल पर तेज-तेज पैडल मारता उसके सामने से निकल कर पाशर्व में बनी एक कोठी में जाकर लुप्त हो गया.
लेकिन वह हर तरह से आश्वस्त हो जाना चाहता था. इसीलिए एक निगाह अपने साथियों
पर डाल, सीधे कोठी के चारों तरफ फैले वातावरण को सूंघने की कोशिश की. कहीं कोई ख़तरा न पाकर, धीरे-धीरे कोठी के सामने वाले दरवाजे के करीब पहुंच गया. कंटीली फेंसिंग से घिरी, फूलों से लदी यह कोठी कितनी सुन्दर लग रही थी.
अब फिर एक अजीब सी आशंका उसके दिल और दिमाग में कुनमुनाने लग गयी थी.
क्या संपन्न घरों की युवतियां इस तरह के कार्य कर सकती हैं. नहीं....नहीं, कहीं उसके दिमाग को गलतफहमी तो नहीं हो गयी है. आखिर कौन सी परिस्थितियाँ उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं.
ध्यान आया. उसने कहीं पढ़ा था कि संपन्न घरों की लड़कियां प्रेम में किन्हीं गलत व्यक्तियों
के चक्कर में फँस कर तमाम उम्र उनके इशारों पर कठपुतलियां बनी नाचती रहती हैं. कहीं इसके साथ भी वैसा ही चक्कर तो नहीं..... "ओह माई गाड...... " सोचते -सोचते उसका सिर बुरी तरह भन्नाने लगा था. तभी उसकी नौकरी ने उसकी भावनाओं की केंचुल काट कर एक तरफ फ़ेंक दी. लगा... कोई उसके पीछे खड़ा पूछ रहा है सर , आपको किससे मिलना है ? " मिसेज मालविका इसी कोठी में रहती हैं," - उसे नीचे से ऊपर तक घूरते हुए पूछा.
" हाँ ", लेकिन आप कौन हैं ? बड़े ही अटपटे ढंग से उस व्यक्ती ने पूछा था।
"देखिये , मैं उनके घर से आया हूँ", मुझे जरूरी काम के तहत मिलना है।"
घर का नाम सुनते ही उसने अपने पीछे आने का इशारा किया. और वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा . मेन दरवाजे पर पहुंचते ही उसने कालबेल के पुश बटन को दबाया. दरवाजा किसी बूढ़ी औरत ने खोला था. बूढ़ी औरत को देखते ही उस व्यक्ती ने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा,"मांजी ! ये सज्जन बहूजी के घर से आए हैं और उनसे मिलना चाहते हैं."
बूढ़ी औरत ने हाथ के इशारे से अन्दर जाकर बैठने को कहा तथा जोर से आवाज दी ,"बहू !आपसे कोई मिलने आए हैं."
"अभी आती हूँ" की आवाज से वह फिर बुरी तरह चौंक गया। आवाज जानी पहचानी सी लगी। कहीं? ये निशा तो नहीं? लेकिन यह कैसे हो सकता है दो नामों से जुडी युवती कहीं एक तो नहीं है. अगर यह निशा है तो फिर मालविका कौन?
लेकिन निशा ऐसा कार्य क्यों करेगी. उसे किस चीज की कमी है. ये निशा नहीं हो सकती है. जरुर उसे भी गलतफहमी हो गयी है.
"सर, यह तो मालविका का ही फोटो है". जब तक वह संभल पाटा. एक आवाज उसके कानों से दुबारा टकरा ईको करने लगती है.
"कहिये !" के साथ ही एक युवती दरवाजे पर खड़ी, शालीन मुस्कराहट के साथ, उसका स्वागत कर रही थी.
उस युवती को देखते ही वह , अब पूरी तरह से धुंआ-धुआं होने लग गया था. सिर्फ इतना ही कह सका,"आप!"
"मेरा नाम मालविका है." कुछ सकपकाते हुए उसने कहा. "लेकिन"?
उत्तर देने की बजाए वह हवलदार रामसिंह को बड़ी पैनी निगाह से घूरने लग गयी थी. उसके चेहरे पर हवाईयां उडती हुई दिखाई दे रही थी. वह जब तक हवलदार रामसिंह को चुप रहने का ईशारा करता हुआ मालविका उर्फ निशा नाम की उस युवती ने एक मिनट कह - अन्दर चली गयी. तभी उस बूढी औरत ने कमरे में प्रवेश किया. अन्दर आते ही कहने लगी,"अरे ! बहू नहीं आई अभी तक ." और उसके साथ ही बहू को आवाज दी.
"मैं चाय बना रही हूँ मेहमानों के लिए। अन्दर से घुमड़ती हुई मालविका की आवाज आती है.
अब इस बात का कतई संदेह नहीं रह गया था कि वह निशा ही है. लेकिन ... कई घुमावदार सवाल मस्तिष्क के दालानों में से गुजरते हुए चीत्कार कर उठते हैं.
तभी एक भयानक चीख पूरी कोठी में व्याप्त हो जाती है. और सब तेजी के साथ रसोई घर की तरह दौड़ पड़ते हैं. जहां मालविका उर्फ निशा लम्बी हिचकी के साथ अंतिम सांस तोड़ देती है. उसकी आँखों के सामने धुंए का बहुत बड़ा गुबार पूरी रसोई में तीखी गंध के साथ फैल कर उसके सारे सवालों को अनुत्तरित छोड़ जाता है.

लगा, जिस निशा को वह बरसों से जानता है वह तो कब की मर चुकी है. यह निशा नहीं हो सकती हाँ, मालविका जरुर हो सकती है. कभी लगता, कहीं एक कफन में दो मुर्दे तो नहीं फूँक दिए गए हैं.

यह सब सोच - सोच कर वह, अन्दर तक घृणा, क्रोध तथा पश्चाताप की भावना से भर उठता है. हवा एक बार फिर तेज हो उठती है जो लगातार कटखनी कुतिया की तरह आज भी उसका पीछा कर रही है. जिसके स्पर्श मात्र से कभी वह रोमांचित हो जाया करता था . यही वो क्षण होते हैं जहां यादें स्मृति की तलहटियों में पदचाप करती हुई जिन्दगी को अबूझ सिरों को सायास ही अंधेरी घाटियों की ओर धकेल कर आदमी को तमाम जागृत अहसासों के मध्य निपट अकेला छोड़ जाती है. और वह.... लगातार उन्हीं रहस्यमई घाटियों में उलझता हुआ खामोशियों के फैले घेरों में और खामोश होता चला जाता है, शायद .....

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Wednesday, 11 August 2010

अशोक आंद्रे

घर की तलाश

मुद्दतों के बाद लौटा था वह
अपने घर की ओर,
उस समय के इतिहासिक हो गए घर के
चिन्हों के खंडहरात
शुन्य की ओर ताकते दिखे प्रतीक्षारत .
उस काल की तमाम स्मृतियाँ
घुमडती हुई दिखाई दीं ,
हर ईंट पर झूलता हुआ घर
भायं-भायं करता दीखा,
दीखा पेड़ , जिसके नीचे माँ इन्तजार करती थी
बैठ कर
शाम ढले पूरे परिवार का .
उसी घर के दायें कोने में पड़ी सांप की केंचुली
चमगादड़ों द्वारा छोडी गयी दुर्गन्ध
स्वागत का दस्तरखान लगाए मिलीं ,
जबकि दुसरे कोने में
मकड़ी के जालों में उलझी हुई
स्मृतियों के साथ
निष्प्राण आकृतियाँ झूल रही थीं
घर के आलों में भी काफी हवा भर गयी थी
जिसे मेरी सांसें उनसे पहचान बनाने की
कोशिश कर रही थीं,
हाँ, घर की टूटी दीवार पर लटकी छड़ी
बहुत कुछ आश्वस्त कर रही थी
टूटे दरवाजों के पीछे
जहां कुलांचें भरने के प्रयास में जिन्दगी
उल्टी- पुलटी हो रही थी,
उधर आकाश चट कर रहा था-
उन सारी स्थितियों को
जिन्हें इस घर की चहारदीवारी में सहेज कर
रख गया था
इड़ा तो मेरे साथ गयी थी
लेकिन उस श्रद्धा का कहीं कोई निशान दिखाई
नहीं दे रहा था
जिसे छोड़ गया था घर के दरवाज़े को बंद
करते हुए,
अब हताश, घर के मध्य
ठूंठ पर बैठा हुआ वह
निर्माण के सारे तथ्यों को ढूंढ रहा था,
जिसका सिरा बाती बना इड़ा के हाथ पर
जलते दीये में ही दिख रहा था,
बीता हुआ समय कल का अंतर बन कर
खेत में किसी मचान सा दिख रहा था
जिस पर बैठ कर
सुबह का इन्तजार कर रहा था वह
ताकि घर को फिर अच्छी तरह टटोलकर
सहेजा जा सके .



सपने

सपने हैं कि पीछा नहीं छोड़ते
हर रोज अजीबोगरीब सपनों का
सहारा लेकर
अनगिनत सीढ़ियों को घुटनों के बल
विजीत करने की कोशिश करता है वह,
यह व्यक्ति की फितरत हो सकती है
जो,उसे आकाश में भी सीढ़ियों का
दर्शन करा देती है.
सीढ़ियों पर खड़ा व्यक्ति
अपने से नीचे खड़े व्यक्ति को
उसके शास्त्र से जूझने को कहता है.
एक सीढ़ी, दो सीढ़ी पहाड़ तो नहीं
बन पाती है.
हाँ उसके व्याख्यायित आख्यानों का
विस्तार जरूर होती है.
उसी विस्तार को छूने के लिए
वह भी सपनों को विस्तार देता है
और घुटनों में ताकत देता हुआ
अपने अन्दर ही
छू लेता है उन सपनों को.

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Friday, 25 June 2010

अशोक आंद्रे

एकांत

शहर से निकल कर, वह सुनसान घने जंगल की तरफ चल पड़ा . किसी डरावने परिवेश में लिपटी हुई जंगल की खामोशी उसे आमंत्रित कर रही थी. जंगल, जहां छोटे-बड़े पेड़ों की विशाल फौज और उनके नीचे किसी अनबूझ पहेली की तरह बेतरतीबी से बिछी हुई हरी-भरी घास . उनके पैर गतिवान थे किसी अजनबी अज्ञात की ओर .
अचानक अट्टहास का क्रूर स्वर .
पैर ठिठक गए .जीवन के सभी प्रश्न एक साथ विस्मय से चीख उठे , " कौन है"?
फिर अट्टहास.
घबराहट ने थोड़ी हिम्मत बटोरी - " कौन हंस रहा है", इस एकांत में ? सामने क्यों नहीं आता .
"मैं" मैं वही हूँ जिसकी तलाश में तुम अज्ञात में पलायन कर रहे हो ".
" क्या मतलब ?"
" मैं हूँ एकांत" .
" लेकिन तुम इतने क्रूर, इतने डरावने क्यों लग रहे हो"?
" अंत हमेशा डरावना ही लगता है. तुम एक अंत की ओर ही तो बढ रहे हो. जीवन के प्रश्नों से भाग कर , एकांत का उत्तर खोजने वाला राही एक डरावने अंत से अधिक कुछ नहीं पा सकता.
" नहीं ....नहीं, मैं अंत नहीं चाहता .....मैं अंत नहीं चाहता ....मैं जीवन चाहता हूँ.....
और वह उल्टे पैरों जीवन के प्रश्नों की ओर लौट पड़ा .


....................


A REVERIE - by ashok andrey

Great silence of trembling darkness at evening
Melts in the chores, scattered in my surrounding.
So-called "extract" of my trembling dreams
Remains untouched to the shadows of eternal thoughts,and
Chases me in the emotions of frozen past.
shapeless echoes over great eclat.

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Sunday, 20 June 2010

अशोक आंद्रे

समय, बहुत नचाया है तुमने

बहुत नचाया है समय, तुमने ।

हरे पत्तों से उठती रेशमी लहरों में,
तटों के आह्वान पर
समुद्र में उठे सफेद फेनिलों में,
पक्षियों के फैले परों तले
दोहर ओढ़े नाचा हूँ मेघों की लय पर,
हाँ, कितना नचाया है तुमने ।

कालभैरव का मुख कितना गहरा होता है,
ब्रह्म का मौन कितना गहन होता है,
विशवास डोलता है अपनी ही तरंगों पर
रात्री विस्तार पैदा करती है
दिन सिकोड़ देता है सब कुछ
समय और समय के मध्य,
कितना बिखराया है सर्वस्व,
ओ समय, कितना नचाया है तुमने ।

प्रार्थना के स्वर कहीं दूर झंकृत हो रहे हैं ,
नदी का जल कहीं डूब पैदा करता है.
भंवरें घेर लेती हैं अस्तित्व का सार
किसको भजूँ समाधि के पारावार में
सब कुछ उलट जाता है विस्तार में

क्योंकि , परछाइयों से ही तो प्यार किया है आज तक
इसीलिए तो नचाते रहे हो समय
मुझे मेरी ही धुरी पर लगातार ।

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Monday, 2 November 2009

कहानी - अशोक आंद्रे

क्षितिज

आज सुभह से ही नयनार बाबू का मन उद्ग्विन है . पता नहीं रह-रह कर अतीत की अंधेरी तलहटियों में जाने किसको ढूंढ़ रहे हैं. कमरे का अँधेरा उनके चारों ओर घेराबंदी करता दिखाई दे रहा है. वर्तमान के सभी कपाट बंद गली की तरफ खुले हैं. ऐसा महसूस होता है मानो सारे रास्ते अंधी प्रतीध्व्निओं की तरह प्रस्थान बिंदु तरफ लौट रहे हैं.
मन हुआ एक बार फिर दोरेन को जाकर देख आएं. पता नहीं उसे क्या हो गया है. अक्सर शाम को बिना खाए सो जाता है. फिर लगा की शायद अब तक सो गया होगा. पर मन नहीं माना, आखिरकार उठना पड़ा.
धड़ाम की आवाज के साथ ही मेज पर पड़ा शीशे का गिलास गिर कर चूर-चूर हो गया. कमरे में फैले सन्नाटे को चीर, झनझनाती हुई आवाज रोशनदान के रास्ते बाहर हो गयी.
लगा, उनके अन्दर भी तो ख़ौफ खाया द्वंद्व समुद्र की तरह दहाडें मारता सारे विश्वासों को चट्खाकर व्यंग्य मिश्रित अट्टहास लगाता भाग खड़ा होता है.
हाँ,उनका पूरा जीवन भी तो समुद्र के समान है. जिसमें फैले खारे एहसास प्रतिपल चिंघाड़ते रहते हैं. वहां हर कोई अपने-अपने जहाजों में लगे ब्लेडों से उनके नर्म सीने को लहू-लुहान करता रहता है. शायद हर किसी को किनारा पाने की जल्दी रहती है.किन्तु एक बार भी जिसे किनारा मिल गया, लौटने का नाम नहीं लिया उसने. मन हुआ एक बार जोर से चीखें. लेकिन ऐसा कर नहीं पाए. इस तरह के एहसास उन्हें उत्तरोतर अवाक करते रहे हैं.
इतने कमजोर तो पहले कभी नहीं थे. सामने की दीवार पर चिपकी घड़ी की टिक-टिक
लगातार कमरे की शान्ति को भंग कर रही थी. भूत वर्तमान पर खडा पिछले बीस सालों के इतिहास को बेतरतीब उसके समक्ष भग्नावस्था में पेश कर रहा था.
उन अवशेषों में पिता का चित्र गायब था. जिनके बारे में उन्होंने सिर्फ माँ के शब्दों
में एहसास किया था.
जब भी उन्होंने माँ से पिता के बारे में पूछना चाहा, माँ अपने पल्लू के एक छोर
से डबडबाई आँखों को पोंछने लगतीं. उन आँखों के पार फैले आंसुओं में सारे सवाल निरर्थक
हो डूबने लगते. यह सब सोचते हुए उनका मन फिर उदास हो गया. तभी बाहर अशोक के पेड़
पर किसी पक्षी की फड़फड़ाहट से तंद्रा टूट जाती है. लेकिन पेड़ की स्थितीप्रज्ञता पर कोई असर नहीं होता है.
अब हवा जरुर तेज बहने लगी थी बाहर. और वे उठकर कमरे से बाहर आ गये . कमरे
के बाहर का वातावरण अच्छा लग रहा था. अन्दर की घुटन छंटने लगी थी. वे जब भी इस पेड़ के नीचे बैठते उनकी नवविवाहिता पत्नी निवेदिता अक्सर उनके करीब आ बैठती. पत्नी
निवेदिता ज्यादा पढी-लिखी न थी. शादी के वक्त हाई स्कूल का इम्तहान दिया था. उन लोगों की
बिरादरी में लड़कियों को ज्यादा पढाया नहीं जाता था. इसलिए सिलाई-बुनाई के साथ चौके - बासन में दक्ष कर लड़की के हाथ पीले कर देते थे.
गाँव की जमीन से जुडी इस अल्हड युवती का सौंदर्य कितना दप-दप करता था उन दिनों,
इसका एहसास आज भी उनको है. घंटो उसका हाथ अपने हाथ में लिए बैठे रहते थे. एक बार
तो चेहरे को निहारते हुए पूरी रात इसी पेड़ के नीचे काट दी थी. बरसों से अपने जिस चेहरे को
शीशे में देखा था वही चेहरा उसके सामने बदरंग हो उठता था. लगता किसी ने भिखारी के झोले में हीरे को भिक्षा स्वरूप दे दिया है.
एक दिन इसी पेड़ के नीचे पत्नी निवेदिता ने अपना रिजल्ट कार्ड उनके हाथ में दिया था.
रिजल्ट कार्ड देख कर अवाक रह गए थे. गवई परीस्थितियों में रह कर कैसे पढाई की होगी
इस युवती ने. कई बार स्नेह से भरकर निहारा था कार्ड को. पत्नी के बजाए कार्ड बोल रहा था.
उसकी सफलता से उनका स्वयं का माथा गर्व से तन गया था.
और इसी पेड़ के नीचे एक दिन पत्नी का हाथ थाम पूछा था, "क्या आगे पढने का इरादा
है. "- और फिर निवेदिता का चेहरा निरखने लगे थे.
" जैसी आपकी इच्छा ," इतना कह कर निवेदिता ने सिर्फ अपने पैरों से जमीन को कुरेदा भर था उस वक्त.
क्षण भर के लिए पत्नी के चेहरे को ऊपर उठाकर अपना सवाल फिर से उछाला था. इस
बार निवेदिता ने अपनी इच्छा जाहिर की. और कहा,"पढ़ना चाहती हूँ किंतु...."
इस किन्तु का अर्थ नयनार बाबू जानते थे. .... घर का काम, बच्चों की जिम्मेदारी आदि.
लेकिन, पत्नी के गौरव के लिए स्वार्थी बननेके लिए तैयार नहीं थे. फिर निवेदिता पढ़कर उनका
गौरव भी तो बढ़ाएगी. उन्हें लगा की नारी के विकास के मार्ग में रोडा बनकर वे अपयश नहीं
कमाएंगे. और वे आवेश में आकर निवेदिता को सीने से लगा, आगे पढने के लिए उत्साहित
करने लगे. हाँ, इस बीच उनके एक पुत्र हो गया था. अब निवेदिता की व्यस्तता को देख उन्होंने अपनी जी.ई.की नौकरी के साथ पुत्र को भी संभालने का जिम्मा भी ले लिया था.
इस तरह कितने साल गुजर गये पता ही नहीं चला. निवेदिता की डाक्टरी की पढाई समाप्त हो गयी थी. रिजल्ट का इन्तजार था. इन्तजार के इन्हीं दिनों में उनका दूसरा
पुत्र अनुज घर की चहारदीवारी में किलकारी भरने लगा था.
इधर निवेदिता में पहले से ज्यादा बदलाव आ चुका था. पहले जैसी घर-घुस्सू वाली
मानसिकता के बजाय एक दबंग औरत ने अपनी जगह बना ली थी. बात-बात पर इठलाकर
बोलना निवेदिता के लिए आम बात हो गयी थी तो घर की हर बात में मीन-मेख निकालना
उसकी आदत. गाँव की अल्हड युवती का चरित्र छिन-भिन्न होकर स्टील के फ्रेम में जडित शीशे
के पीछे छुप गया था.
और फिर, एक दिन संज्ञा के साथ विशेषण जुड़कर साकार हो उठा था. वह निवेदिता से
डा.निवेदिता हो गयी थी. कितने खुश हुए थे नयनार बाबू. इतने दिनों की तपस्या आज
फलीभूत हुई थी. निवेदिता ने जब नौकरी की बात चलाई तो उन्होंने उसे स्वेच्छा से इजाजत
दे दी. आखिर डाक्टरी क्या घर बैठने के लिए दिलाई थी. आम हिन्दुस्तानी के करेक्टर को
तोड़ एक नई इमेज स्थापित करनी चाही थी.
और यहीं नयनार बाबू से शायद गलती हो गयी निवेदिता को समझने में. बच्चे बड़े होने
लगे थे. उन्हें पिता के साथ माँ के कोमल हाथों की गंध वाचाल करने लगी थी. छोटा अनुज
तो मौका पाते ही निवेदिता की साडी का एक सिरा थाम अपनी मांगों की फेहरिश्त पेश
करता रहता.
लेकिन निवेदिता इन सारी स्थितियों से बेखबर अपनी ही दुनिया में तल्लीन होने लगी थी. बात-बात पर चिडचिडाहट जाहिर कर वस्तुस्थिती को नकारने की आदत बन रही थी उसकी. कितना समझाया था नयनार बाबू ने प्यार भरे शब्दों से... डाक्टर होने का अर्थ गृहस्थी
को पतझर के हाथों सौपना नहीं है.
आज बड़े के इस सवाल पर चौंकने के साथ खीझे थे और डांटते हुए कहा था,-'किसने कहा
है यह सब पूछने को.'
"लोग माँ के बारे में इस तरह की बात करते हैं पापा." इतना कह, डर के मारे जमीन की ओर देखने लगा था दोरेन.
एक ही शब्द पतुरिया उनके पूरे शरीर में गरम शीशे की तरह खौल रहा था. घर की नई स्थिती, नये सिरे से सोचने को मजबूर कर रही थी. क्या इसी शब्द को सुनने के लिए निवेदिता को पढाया था ? इस सवाल को लगातार अपने आप से पूछ रहे थे नयनार बाबू.
सवाल का दूसरा सिरा हर बार ऐंठने लगता और पूरा शरीर तब लिजलिजे एहसास को महसूसता गंधाने लगा था. आखिर बड़ा क्यों इस शब्द का अर्थ पूछता है ?
घर लौटने पर निवेदिता को कितना समझाया था उस दिन. बड़ी खूबी से सवाल को हंसकर टालने की कोशिश करते हुए निवेदिता दूसरी तरफ देखने लगी थी. उसकी इस बेरूखी को सह पाना असहनीय हो रहा था नयनार बाबू के लिए. एक बार फिर समझाते
हुए कहा था,"निवेदिता ! क्या तुम आसपास उठते सवालों को महसूस नहीं करती हो ? मेरा
मतलब है कि....आज फिर दोरेन ने उसी शब्द का अर्थ पूछा था....क्या जवाब दूं उसे ?....
बोलो..."
निवेदिता कुछ देर तक मेज पर पड़ी अपनी किताबों को उलटती-पलटती रही. मानो
जवाब से कतराना चाहती हो.
"मैंने कुछ कहा है निवेदिता", दयनीय हो चले थे नयनार बाबू.
"तुम सारे के सारे पुरुष एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो".
कोई फर्क नजर नहीं आता है आम आदमी और तुममें ..... खुद तो पत्नी के साथ-साथ
दो-तीन प्रेमिकाओं की आकांक्षाएं लिए ताका-झांकी करते रहोगे .... तब कोई भी अंगुली नहीं
उठाएगा, अगर ....अगर कोई नारी किसी पुरुष से दोस्ती का हाथ भी बढ़ा दे तो... तो तुम
सब ईर्ष्या की आग में दहकने लगते हो. आखिर क्या किया है मैंने ?.... जो तुम आसमान
को सर पर उठाए चीख रहे हो." इतना कहते हुए क्रोध से हांफने लगी थी निवेदिता.
नयनार बाबू को तो जैसे सांप सूंघ गया था. पूरा शरीर गुस्से के मारे काँपने लग गया
और अंत में गुस्से का ज्वालामुखी फूट ही पड़ा नयनार बाबू के अन्दर से.एक झन्नाटेदार
थप्पड़ की रेखाएं छाप दी थीं निवेदिता के मुख पर. और फिर ....काफी दिनों तक पछताए थे ...
कोसा था अपने आप को कि कितना गलत निर्णय लिया था इसी पेड़ के नीचे . पेड़ .... जो
उनके साझे प्यार का साक्षी था, नफरत का गवाह बन गया.
अनिर्दिष्ट लहर सी, लम्बी भटकन के लिए निकल पड़ी थी डा. निवेदिता - हाँ डा. निवेदिता ही. छोड़ गयी थी एक पत्र पढने के लिए....
पता नहीं किस शब्द से संबोधित करूं ! मेरी डिक्शनरी में कोई शब्द सार्थक होकर उभर
नहीं रहा है. इसके पीछे आपकी संकीर्ण भावना स्वार्थों से परे पीछा करती रही है.
शायद उसी का प्रतिफल ही तो आपका झन्नाटेदार चांटा था. जो उस दिन मेरे पूरे व्यक्तित्व को खंडित करता चला गया. उस खंडित स्वरूप को लेकर जीना मेरे लिए असंभव
हो उठा है. आपके अन्दर प्रतिपल जीवित होते अविश्वास ही इस नियति के पीछे है. इसीलिये
खुद को आपसे अलग करना जरूरी हो गया है.
यह पत्र छोड़े जा रही हूँ आपके लिए. प्रिय शब्द किसी ख़ास के लिए जोड़ा जाता है.
उस शब्द को छल नहीं सकती हूँ. प्रिय से ज्यादा राक्षस कहना उचित लग रहा है. जो सिर्फ
अपने लिए, अपने द्बारा बनाए गए नियमों में दूसरों को बाँधना जानता है. कितना गलत दृष्टीकोण है मेरे प्रती सोचने का. कभी उफनती नदी को भी बांधा जा सकता है. नदी को बाँधने का मतलब है उसे पोखर की संज्ञा देना, जिसमें सड़ांध के सिवा कुछ भी नहीं मिलता
है.
इसलिए जा रही हूँ अपनी मंजिल की तलाश में. किन्तु मेरी मंजिल वह नहीं है जिसे
तुमने माना था.
मैं अपनी आजादी का एहसास स्वछंदता में महसूस करती हूँ. जहां बंद कमरे की सीलन
का कोई अर्थ नहीं होता.
और...दो बच्चे.... उसी बंद कमरे की सीलन हैं, जिसकी बदबू मात्र से जिन के अस्तित्व
को खंडित होता महसूस किया है.
और नीचे दस्तखत भी नहीं थे....
* * * * *
इस घटना को बीते करीब दस साल हो गए हैं. जिन्दगी बड़ी सायास हो बीत रही थी.
उनके अतीत को कुरेदने की कोशिश नहीं की थी कभी बच्चों ने. हाँ, वे जरुर उदास हो जाया
करते थे. पता नहीं क्यों अतीत की गहराइयों से निकलने के बावजूद आदमी , उन्हीं गहराइयों की तरफ लौटने की कोशिश करता है जबकि उस तरफ के सारे रास्ते बंद हो
चुके होते हैं.
कल दोरेन काफी जिद कर रहा था. उसके कालेज की छुट्टियां हो गई थीं दो महीने के लिए. अक्सर बाहर घूमने के लिए जिद करता था, गर्मियोंकी छुट्टी बिताने के लिए. कई बार
सोचा उसे अकेले भेजने को, पर मन नहीं माना. बाप की ममता आड़े आ जाती थी. यही सोच
बच्चों के साथ शिमला घूमने की तैयारी कर ली इस बार. आखिर इस भुतहे शहर से कुछ
दिन छुटकारा तो मिल जाएगा.
आज दोनों बच्चे काफी खुश नजर आ रहे थे. शिमला आए एक महीना हो चला था. बर्फ से
ढके पहाड़ काफी खूबसूरत नजर आ रहे थे. सूनी तथा शुष्क पहाडियों में काफी हलचल थी.
इधर-उधर छितराए से सैलानी बांहों में बाहें डाल मस्ती में घूम रहे थे.
काफी समय व्यतीत हो गया था और बच्चों के साथ घुमते-घामते, हांफने लगे थे अब
नयनार बाबू. चेहरे पर थकान की सलवटें उभर आईं थी. अनचाहे ही बुढापे का एहसास घर करने लगा था. चेहरे पर तिर आई सर्द लहर लो पोंछ दोरेन की तरफ देखा. जो दूर खडा पहाडियों
को अपलक निहार रहा था. छोटा अनुज काफी, थक गया था और उनकी बाहें थामे बार-बार भूख
का एहसास करा रहा था.
कंधे पर लटके किट को उतार, वहीं जमीन पर बैठ गए. और, किट को खोल उसमें से थर्मस निकालने लगे. तभी दोरेन को बुलाने के लिए अनुज से कहा.
"भैया ..." अनुज की आवाज पहाडियों के बीच से निकलती पूरे वातावरण में फैल गयी .
शायद दोरेन को भी भूख लग गई थी तभी तो किट में से खाने का सामान निकालने
लगा. उसकी बेसब्री देख वे स्वयं उसकी सहायता करने लगे. अब वे तीनों वहीं बैठ कर खाने लगे.
इधर सूरज भी पहाडों के बीच फसां अंतिम साँसें ले रहा था. ऊंचे-ऊंचे पहाडों की परछाइयां
उनके ऊपर से होकर पूरे शिमला को बांध रही थीं. और सांय- सायं करती हवा काफी ठंडी हो चली थी. सैलानियों का आना-जाना कम हो गया था. कुछ जोड़े अभी भी घूम रहे थे.
बच्चों को जल्दी खाने की हिदायत देकर नयनार बाबू दूर किसी जोड़े को घूरने लगे . अचानक उनके पूरे शरीर में सुरसुरी होने लगी. पता नहीं ठण्ड से या फिर घबराहट के कारण.
उन्होंने उस जोड़े को दो-तीन बार देखा. "हाँ, यह निवेदिता ही थी जो अपनी मस्ती में किसी
पुरुष की बगल में हाथ डाले घूम रही थी." अपने आप को आश्वस्त करते हुए नयनार बाबू
ने सोचा. आसमान में छितराए बादलों के नीचे बंद कमरे की सीलन से दूर उमड़ती नदी की
तरह चंचल हो रही थी निवेदिता, उनके अन्दर का पुरुष प्रतिशोध से सुलगने लगा.
"शित",शायद दोरेन ने भी उसे देख लिया. तभी तो उसके अन्दर के पुरुष का ईगो दहाड़ने लगा.
"दोरेन", डांटते हुए नयनार बाबू चिल्लाए, " जबान संभाल के बोलो." उन्हें महसूस हुआ
की गिले-शिकवे और हिकारत का हर एक हक़ उनका अपना कापीराईट है जो दोरेन तक उनकी आज्ञा के बिना नहीं पहुंचता. अन्दर ही अन्दर एक ताप से वे पिघलने लगे. ठंडी हवा
रूमाल की तह उभरे हुए पसीने को अपने में जज्ब करती जा रही थी.
चाह कर भी दोरेन को शांत नहीं कर पाए. शायद उनका स्वयं का प्रतिशोध दोरेन
के परशुराम को परिलक्षित कर तन गया था.
आखिर किन संबन्धों के तहत उनका स्वयं का आक्रोश गर्म लावे की तरह फूट रहा था. जिसकी हर डोर कटकर जमीन पर बिखरी उलझ गई थी. चाहे जिधर से पकडो वह अंतिम
सिरे का ही आभास देती है. और फिर .... काफी देर तक निवेदिता को जाते देखते रहे
नयनार बाबू.
दुसरे दिन होटल के कमरा न. १३ के बाहर गैलरी में, अखबार पढ़ते हुए नयनार बाबू
विगलित हो उठते हैं. हर बार उनकी आँखे अखबार की उन लाइनों पर टिक जाती हैं जहां निवेदिता की पथराई आँखें ठंडी देह के बीच उन्हें घूर रहीं थीं.
एक ख़्याल बिजली की तरह कौंधा ... यह खबर दोरेन को कैसी लगेगी क्या वह
रोयेगा या परितोष महसूस करेगा.
उन्हें महसूस हुआ कि यह सवाल ही पहले उनके लिए है उसके बाद कहीं दोरेन
तक पहुंचता है.
अखबार वहीं छोड़ वे उठ खडे हुए, दोनों हथेलियाँ आँखों के सामने कर लीं. मानो
निवेदिता के अंत का रहस्य स्वयं की आँखों से छुपाना चाहते हों. उन्हें महसूस हुआ कि
निवेदिता मरकर भी प्रतिपल उनके साथ जीने के लिए सूक्ष्म हो गई है... जहां न तो शंका के लिए स्थान है और न ही सीलन भरे कमरे की परिकल्पना....
निवेदिता शायद एक क्षितिज थी जो दिखाई तो देता है किन्तु जहां तक
पहुंचा
नहीं जा सकता है.

Monday, 28 September 2009

अशोक आंद्रे

अस्तित्व

सूखी नदी जानना चाहती है
अपने अस्तित्व के बारे में ,
उसकी निगाहें आकाश की तरफ
झाँकती हैं
समय कुछ कहना चाहता है ,
इतिहास , उसके अतीत को पन्नो में दबाए
खामोश है
शब्द नहीं मिलते उसको ,
क्योंकि अतीत ठंडा होता है
शिलालेखों की तरह ,
क्या दे पाता है ?
सिवाय मानसिक तनाव के ।

समय फिर भी नदी की ऐतिहासिक परतों के
नीचे , दबी गुफाओं की खुदाई करता रहता है
ताकि नदी के खंडित होते अस्तित्व के होने न होने
के दस्तावेजों को निकाला जा सके
उधर विचारों के पाल थामें कई नावें
बह जाती हैं समय की धार में
पेड़ों के छाते थामे कई दृश्य
कालज़यी होने की चेष्टा करते
चिह्नत हो जाते हैं शिलालेखों की तरह
उसकी छाती पर ,
जबकि सूखी नदी के अस्तित्व के बारे में --
कौन जानना चाहता है ?

उसके अन्दर का लावा पपड़ी बनकर
शिलालेख होने का आभास तो देता है ,
और बताता है कि
कितनी जिंदगियाँ , उसके आर - पार हो चुकी हैं
नदी सब कुछ जानती है उन शिलालेखों के माध्यम से
अगर नहीं जानती तो सिर्फ अपने सूखे अस्तित्व के
बारे में ,
क्योंकि यहाँ उसकी सतह पर चित्रित्र शिलालेख
वीतरागी हो गये हैं ।

चाँद और मेरा बेटा

चाँद बहुत याद आते हो ।
रात्री के प्रथम पहर में जब
पहाडों के बीच फँस जाते थे तुम,
उस वक्त पास खडा मेरा बेटा
हंसने लगता था
'देखो मामा कहां फँस गये हैं '।
पहाड़ की चोटी को छूते
पेड़ों के पत्तों की सरसराहट
उसके पैरों में थिरकन पैदा करती थी ।

पता नहीं आज मेरा बेटा
कैसे उदास हो गया था
और जिक्र करने लगा तुम्हारा
क्योंकि उसके ज्योमेट्री बॉक्स में रखा
चाँद , जो खो गया था ।

टीचर के डर के कारण खोजने लगा था तुम्हें
आकाश कि ओर देखकर ।
आज तुम तो आए ही नहीं थे
उसे क्या मालुम आज अमावस्या है
और अंधेरे में तुम्हें डर जो लगता है
ठीक मेरे बेटे कि तरह ।

अंधेरे में कुछ दिखाई भी तो नहीं देता
अंधेरा उस वक्त शमशान कि तरह पसर जाता है
यह भी सच है कि
उस पसरने में भी शास्वत आनंद है
राग है जीवन का
जिसे मेरा बेटा समझ नहीं पाता है ।

चाँद तुम ठीक उसी जीवन के सत्य हो
जिसे याद करके बहुत खोता हूँ ,
मेरा बेटा तो भूल गया है सब कुछ
क्योंकि उसके ज्योमेट्री बॉक्स का चाँद जो खो गया है
उसी में उलझा वह
आकाश को कभी - कभार देखता जरुर है
क्योंकि उसकी उदासी में तुम्हारी खामोशी जो पसरी हुई है ।
लेकिन तुमसे एक विनती है
एक बार --
हाँ , सिर्फ एक बार उन ऊचें पहाडों के बीच फँस जाओ
चाहे मेरा बेटा हँसे न हँसे लेकिन मुस्कराए जरुर ।